बच्चों में पढ़ाई के दौरान पेंसिल को मुंह में चबाने की आदत एक सामान्य बात है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि इस पेंसिल के पेंट में लेड (सीसा) होता है? बच्चों के खिलौनों में भी यह पाया जाता है। यही नहीं, लिपस्टिक, नेल पॉलिश और हेयर डाई में भी लेड होता है, जो त्वचा के माध्यम से शरीर में प्रवेश कर जाता है। वहीं, हल्दी में लेड क्रोमेट की मिलावट से यह जहरीली हो जाती है। सड़क किनारे खुले में रखा खाना खाने से डस्ट के जरिए भी लेड हमारे शरीर में प्रवेश कर जाता है। यह खुलासा लखनऊ स्थित इंडियन सोसाइटी फॉर लेड अवेयरनेस एंड रिसर्च (आईएसएलएआर) के प्रमुख प्रो. टी. वेंकटेश ने दैनिक भास्कर से बातचीत के दौरान किया। वेंकटेश ने बताया कि रोजमर्रा की इन चीजों के माध्यम से लेड हमारे शरीर में पहुंच रहा है। इसकी ज्यादा मात्रा बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों की सेहत पर विपरित प्रभाव डाल रही है। बच्चों में इसका असर आईक्यू स्तर पर पड़ रहा है। इससे धीर-धीरे बच्चे मंदबुद्धि हो सकते हैं। इसके अलावा, 30-40 साल की उम्र में ही युवाओं में ऑस्टियोपोरोसिस (हड्डियों का कमजोर होना) का खतरा बढ़ रहा है। शरीर में लेड की अधिक मात्रा कैंसर, हार्ट अटैक जैसी गंभीर बीमारियों का कारण बन रही है। देश के 50 संस्थानों में ही हो रही जांच
प्रो. वेंकटेश ने बताया कि अमेरिका में 1975 से ब्लड लेड लेवल की जांच शुरू हो चुकी है। लेकिन भारत के सभी जिलों में इस जांच की सुविधा अभी तक नहीं है। ब्लड लेड लेवल टेस्ट विश्वसनीय पैथोलॉजी में सिर्फ 10-15 मिनट में किया जा सकता है। वर्तमान में देशभर में सिर्फ 50 संस्थान ऐसे हैं, जहां यह जांच होती है। यह महंगी है। देश के 15 हजार बच्चों की जांच, 50% में लेड की मात्रा अधिक
देश में 12 साल से कम उम्र के 50% से अधिक बच्चों के खून में खतरनाक स्तर तक सीसा (लेड) पाया गया है। एक अध्ययन में 15 हजार बच्चों की जांच में पाया गया कि आधे से ज्यादा बच्चों के खून में सीसा 10-20 माइक्रोग्राम प्रति मिलीलीटर था, जबकि सुरक्षित सीमा 5 माइक्रोग्राम प्रति मिलीलीटर है। 14% बच्चों में यह स्तर 20 माइक्रोग्राम से अधिक था। शरीर में लेड 3 माइक्रोग्राम /100 एमएल से कम होना चाहिए, लेकिन देश के 50% बच्चों में यह 10 माइक्रोग्राम से ज्यादा है। कौन हैं टी वेंकटेश? पूर्व राष्ट्रपति ने दी थी लेड मैन ऑफ इंडिया का नाम
वेंकटेश को पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने लेड मैन ऑफ इंडिया का नाम दिया था। वे गुरुवार को एम्स में आयोजित आईएबीकॉन कॉन्फ्रेंस में शामिल होने आए थे। वे बेंगलुरू के सेंट जॉन्स हॉस्पिटल के बायोकेमिस्ट्री विभाग के प्रमुख रह चुके हैं। उन्हें लेड जागरूकता के लिए लाइफ टाइम अचीवमेंट पुरस्कार मिल चुका है।


