अजमेर जिला बार एसोसिएशन से जुड़े अधिवक्ताओं की ओर से गुरुवार को रैली निकाल कर प्रदर्शन किया गया। सभी अधिवक्ता प्रदर्शन करते हुए कलेक्ट्रेट पहुंचे और जिला कलेक्टर को राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन दिया। ज्ञापन देकर अधिवक्ताओं ने प्रस्तावित अधिवक्ता संशोधन बिल 2025 को लेकर विरोध जताया। अध्यक्ष अशोक सिंह रावत ने बताया कि केंद्र सरकार एडवोकेट अधिनियम 1961 में संशोधन का प्रस्तावित जारी किया है, जो अधिवक्ता संशोधन बिल 2025 के नाम से जारी किया जाना प्रस्तावित है। बिल के माध्यम से अधिवक्ताओं के संवैधानिक अधिकारों को समाप्त करने व उनके आवाज दबाने का प्रयास किया जा रहा है। अध्यक्ष रावत ने कहा कि अधिवक्ता संशोधन बिल की धारा 35ए के अनुसार अधिवक्ताओं का कोई भी संघ कोई भी सदस्य व्यक्तिगत रूप से या सामूहिक रूप से अदालत के कार्य का बहिष्कार हड़ताल या विरत रहने का आवाज नहीं करेगा। यदि करता है तो उसके विरुद्ध अनुशासनमक कार्रवाई करने का प्रावधान है। यह प्रावधान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19 वाक एवं अभिव्यक्ति व अनुच्छेद 21 जीवन व व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन करता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में हड़ताल या कार्य बहिष्कार ही एक महत्वपूर्ण अधिकार है। इसे छीन लेना अधिवक्ताओं की आवाज को दबाने जैसा है। रावत ने कहा कि अधिवक्ता संशोधन अधिनियम बिल की धारा 35 में अधिवक्ताओं पर 3 लाख का जुर्माना लगाने का प्रावधान प्रस्तावित है। यह जुर्माना अधिवक्ताओं के पेश व आचरण को लेकर है। लेकिन इस धारा को लागू करने का तरीका पक्षपात पूर्ण है इससे अधिवक्ताओं अनावश्यक दबाव बनेगा और अधिवक्ताओं के कार्य करने के स्वतंत्रता भी प्रभावित होगी। साथ ही उक्त धारा में झूठी शिकायतकर्ता पर 50 हजार का जुर्माना लगाने जाने का प्रावधान है। परंतु इस धारा में अधिवक्ताओं की सुरक्षा के लिए कोई प्रावधान नहीं है। यह धारा एक तरफ गलत और अन्य पूर्ण प्रतीत होती है। अध्यक्ष ने बताया कि इस बिल के माध्यम से विदेशी फर्म व विदेश में काम करें अधिवक्ता भी भारत की अदालत में काम करने आ सकेंगे। जिससे भारत में काम करने वाले अधिवक्ताओं का हक श्रीण हो जाएगा। इस बिल को लेकर संपूर्ण भारत के अधिवक्ताओं में रोष व्याप्त है। अजमेर बार संगठन ने भारत सरकार को चेतावनी देना चाहती है अधिवक्ता संशोधन बिल 2025 में इस तरह का कोई संशोधन ना करें जिससे अधिवक्ताओं के हितों पर कुठाराघात हो।


