भास्कर न्यूज | जशपुरनगर झारखंड-छत्तीसगढ़ सीमा पर गुमला जिले के जारी प्रखंड में बालू के अवैध कारोबार के खिलाफ अब जन-आंदोलन शुरू हो गया है। गोविंदपुर पंचायत के तिगरा और कमलपुर के ग्रामीणों ने प्रशासन की सुस्ती से तंग आकर अब आर-पार की लड़ाई का ऐलान कर दिया है। प्रशासनिक विफलता को देखते हुए ग्रामीणों ने अपनी सुरक्षा प्रणाली तैयार की है। गांव के युवाओं की विशेष टीम बनाई गई है, जो दिन-रात घाटों पर नजर रखेगी। अवैध खनन में लिप्त वाहनों को ग्रामीण खुद रोकेंगे और तुरंत पुलिस-प्रशासन को सूचित करेंगे। ग्रामीणों ने संवेदनशील रास्तों पर तत्काल चेक पोस्ट बनाने और गश्त बढ़ाने की मांग की है। दरअसल झारखंड के इन गांवों से जशपुर जिले के तस्कर लेवी वसूली का काम करते हैं। इनमें से अधिकांश झारखंड के हैं। ग्रामीणों के अनुसार सीमावर्ती जशपुर जिले के बालू माफिया और ट्रैक्टर मालिक इस क्षेत्र को अपनी जागीर समझ बैठे हैं। ग्रामीण विमल भगत ने बताया कि बिना किसी वैध चालान या अनुमति के हर दिन 50 से अधिक ट्रैक्टर के जरिए तिगरा और कमलपुर घाटों से बालू का अवैध उठाव किया जा रहा है। पिछले महीने जिला खनिज अधिकारी को ज्ञापन सौंपा था। अधिकारी ने आश्वासन तो दिया, लेकिन रेत माफियाओं का काम बंद नहीं हुआ। अब हम अपनी नदियों को दम तोड़ते नहीं देख सकते। बैठक में उपस्थित महिलाओं और बुजुर्गों ने पर्यावरण को लेकर चिंता जताई। अनियंत्रित खनन के कारण लावा नदी का अस्तित्व खतरे में है। ग्रामीणों का आरोप है कि मशीनों के प्रयोग से नदी का स्वरूप बिगड़ गया है और क्षेत्र का जलस्तर तेजी से नीचे जा रहा है। यही हाल रहा तो भविष्य में खेती और पीने के पानी के लिए हाहाकार मचेगा। प्रशासन को एक सप्ताह का अल्टीमेटम: संत कुमार भगत की अध्यक्षता में आयोजित जनसभा में ग्रामीणों ने प्रशासन को एक सप्ताह का समय दिया है। यदि सात दिन के भीतर खनन पर पूर्ण विराम नहीं लगा, तो सैकड़ों की संख्या में ग्रामीण गुमला जिला मुख्यालय का घेराव करेंगे। बैठक में दिनेश उरांव, राजकुमार उरांव, धनेश्वरी उरांव, सरस्वती उरांव समेत बड़ी संख्या में लोग मौजूद थे। जिला खनिज अधिकारी विभूति प्रसाद के अनुसार मामला उनके संज्ञान में है। नगर निकाय चुनाव की व्यस्तता के कारण फिलहाल स्थल का निरीक्षण नहीं किया जा सका है। जल्द ही जांच कर दोषियों पर कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी। सीमावर्ती इलाके मनोरा की तहसीलदार नीतू भगत ने बताया कि उन्हें रेत उत्खनन और ग्रामीणों के विरोध की जानकारी नहीं है।


