सामान्य प्रशासन विभाग (जीएडी) के स्पष्ट निर्देश हैं कि नेता व सरकारी कर्मचारियों के जाति प्रमाण-पत्र के संबंध में संदेह होने पर तीन माह में जांच कर कार्रवाई की जाए। इसके विपरीत प्रदेश में 14-15 सालों से जांच पेंडिंग है। सरकारी नौकरियों में जाति प्रमाण-पत्रों की संदिग्धता के 17,153 मामले हाई कोर्ट में लंबित हैं। 2008 से 2024 के बीच के ही 150 से ज्यादा प्रकरणों में जांच होनी है। सांसद के तो दो कार्यकाल होने पर पता चला कि प्रमाण पत्र फर्जी है। दिलचस्प यह कि इसी बीच ऐसे कई अफसर रिटायर भी हो गए हैं। एक मामला एनएचएआई में चीफ इंजीनियर आनंद लिखार का है। उनके पास महाराष्ट्र के हलवा जनजाति का प्रमाण-पत्र है, जिसे मप्र में राज्य स्तरीय छानबीन समिति रद्द कर चुकी है। इस पर उन्होंने 10 साल से हाई कोर्ट से स्टे ले रखा है। अब तक न छानबीन समिति और न विभाग ने स्टे वैकेट कराया। आईएएस ललित और शीला दाहिमा के मामले में भी हुई शिकायत : आईएएस ललित दाहिमा और शीला दाहिमा एमपीपीएससी में अजा वर्ग से सिलेक्ट हुए। उनके पिता मान दाहिमा आईएएस बनने के बाद 1976 में राजस्थान से मप्र आए थे। मप्र में आरक्षण का लाभ उसी को दिया जाना है, जिनके पिता या वे 1950 से पहले से मप्र में रह रहे हैं। इस संबंध में शिकायत की गई है। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने 1994 में माधुरी पाटिल केस में फैसला दिया था कि जो व्यक्ति जिस राज्य में 1950 से पहले से रह रहा है, उसे और उसके बच्चों को उसी राज्य में अजा-जजा आरक्षण का लाभ दिया जाए। इसके लिए उसके पूर्वजों के राजस्व रिकाॅर्ड की जांच की जाए। बिना जवाब लिए क्लीन चिट : सागर में पीडब्ल्यूडी चीफ इंजीनियर चंद्रपाल सिंह की एसटी जाति को लेकर 1 साल पहले शिकायत हुई। उनके पिता रतनलाल अजा विभाग में अफसर थे। समिति ने जानकारी मांगी कि उनके पिता सेवा में किस श्रेणी में भर्ती हुए। ये सूचना नहीं दी गई। समिति ने इसे इग्नोर करते हुए क्लीन चिट दी। मप्र के कई आईएएस अफसर और मंत्री भी कठघरे में… फिर भी सुस्ती ज्योति धुर्वे… बैतूल से सांसद रहीं दो कार्यकाल पूरे होने के बाद पता चला कि जाति प्रमाण-पत्र फर्जी है 2009 से 2019 तक बैतूल से सांसद रही। यह एसटी के लिए आरक्षित सीट है। 2009 में ज्योति का गोंड जाति का प्रमाण-पत्र संदिग्ध होने की शिकायत हुई, पर कार्रवाई नहीं हुई। 2019 में उनका एमपी का कार्यकाल भी खत्म हो गया। हाई कोर्ट के निर्देश पर राज्य स्तरीय छानबीन समिति ने जांच की तो प्रमाण-पत्र फर्जी निकला। गौतम टेटवाल..अभी मप्र में राज्य मंत्री 2015 में समिति की क्लीनचिट, अब हाई कोर्ट ने फिर जांच के आदेश दिए मंत्री गौतम टेंटवाल के जाति प्रमाण पत्र पर भी विवाद है। इस मामले में हाई कोर्ट में दायर याचिका के मुताबिक, टेटवाल की जाति जीनगर है, जो ओबीसी है। टेटवाल ने सारंगपुर एससी सीट से 2008 में जीत दर्ज की। छानबीन समिति 2015 में टेटवाल को क्लीनचिट दे चुकी है। 2 माह पहले हाई कोर्ट ने छानबीन समिति को जांच के आदेश दिए हैं। जजपाल जज्जी… पूर्व विधायक हाई कोर्ट की सिंगल बेंच ने प्रमाण-पत्र रद्द किया, डबल बेंच से राहत एससी आरक्षित सीट अशोकनगर से 2018 में विधायक बने जजपाल जज्जी की जाति पर सवाल उठे हैं। हाई कोर्ट की सिंगल बेंच ने उनके अनुसूचित (नट) जाति प्रमाण-पत्र को खारिज कर दिया था पर अगस्त 2023 में डबल बेंच से राहत मिल गई। इससे पहले जज्जी ने ओबीसी प्रमाण-पत्र के आधार पर निकाय चुनाव जीता था। जिस गति से शिकायतें हल होनी चाहिए, नहीं हो पा रहीं… आगे दिखवाएंगे सीधी बात - डॉ. ई. रमेश कुमार, अध्यक्ष राज्य स्तरीय छानबीन समिति जाति प्रमाण-पत्र की जांच 14 साल से केस लंबित हैं?
– समय-समय पर समिति की बैठकें होती हैं, उनमें जाति प्रमाण-पत्र की शिकायतों का निराकरण करते हैं। पेंडेंसी ज्यादा है। जिस हिसाब से शिकायतों का निराकरण होना चाहिए, नहीं हो पा रहा है। बड़ी संख्या में मामले हाई कोर्ट पहुंच रहे हैं।
– न्यायालय के आदेश का पालन करते हैं। ऐसे मामलों का परीक्षण किया जाता है।


