कांकेर| वरिष्ट आदिवासी नेता सरजू शोरी ने कहा छत्तीसगढ़ की आत्मा गांव, खेत व सघन वनों में बसती है। हर बजट में किसान और वनोपज से अपनी जीविका चलाने वाला आदिवासी समाज काफी उम्मीद होती है। लेकिन इस बार भी छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार के पिछले दो बजट की तरह ही तीसरे बजट में भी उन्हें निराशा ही हाथ लगी है। इसे विकास का बजट बताया जा रहा है लेकिन गाँव और वनांचल के क्षेत्र से जोड़कर देखें तो हकीकत कुछ और ही है। छोटे किसान और वनोपज से अपनी जीविका चलाने आदिवासी परिवारों को बजट में कोई उम्मीद दिखाई नहीं दी। छत्तीसगढ़ की असली पहचान उसके गांवों से है और 70 प्रतिशत से अधिक आबादी गांव की है। लेकिन इस बजट में ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने कोई ठोस योजना नहीं है। छोटे किसान आज सबसे ज्यादा परेशान हैं। फसल का उचित दाम नहीं मिल रहा, सिंचाई की व्यवस्था कमजोर है, खाद-बीज महँगे हो गए हैं और फसल बीमा का पैसा तक समय पर नहीं मिलता। ऐसे में उम्मीद थी कि बजट में छोटे किसानों के लिए विशेष पैकेज या नई योजनाएं आएँगी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। जिससे स्पष्ट है कि किसान की चिंता सरकार की प्राथमिकता में नहीं है। छत्तीसगढ़ देश का सबसे बड़ा वन उपज संग्राहक राज्य है। बस्तर, सरगुजा जैसे प्रदेश के वनांचलों के ग्रामीण महुआ, इमली, सालबीज, चिरौंजी, कोदो, कुटकी, रागी और तेंदूपत्ता जैसे वनोपज से अपना घर चलाते हैं। लेकिन बजट में वनोपज के संग्रहण, उसकी सही कीमत, स्थानीय स्तर पर प्रोसेसिंग यूनिट्स और उनके लिए बाजार विकसित करने कोई योजना नहीं है।


