भास्कर न्यूज | गढ़वा संस्कार भारती झारखंड के कला धरोहर संयोजक नीरज श्रीधर ने कहा कि भारतीय लोकसंस्कृति की समृद्ध परम्पराओं में चैत्र मास में गाया जाने वाला चैता विशेष महत्व रखता है। सदियों पुरानी यह लोकगायन परम्परा आज भी बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और झारखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में लोकजीवन का अभिन्न हिस्सा बनी हुई है। चैत्र मास के आगमन के साथ ही गांवों में चैता गीतों की मधुर ध्वनि वातावरण को उल्लास और उत्साह से भर देती है। उन्होंने कहा कि हिंदू पंचांग के अनुसार चैत्र मास वर्ष का पहला महीना माना जाता है। यह बसंत ऋतु के अंतिम चरण का समय होता है, जब प्रकृति अपने सौंदर्य के चरम पर होती है। खेतों में पक चुकी फसलें, आम के पेड़ों में आए बौर और सुहावना वातावरण ग्रामीण जीवन में नई ऊर्जा का संचार करते हैं। इसी प्राकृतिक सौंदर्य और भावनात्मक उमंग को लोकगीतों के माध्यम से व्यक्त करने की परम्परा ही चैता गायन है। उन्होंने कहा कि चैता गीतों में लोकजीवन की सरलता और भावनाओं की सच्ची अभिव्यक्ति देखने को मिलती है। इन गीतों में प्रेम, विरह, मिलन, प्रकृति की छटा और सामाजिक संबंधों की मार्मिक झलक मिलती है। कहीं नवयौवन की उमंग दिखाई देती है तो कहीं प्रिय के वियोग की पीड़ा। यही कारण है कि चैता केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि लोकमानस की संवेदनाओं का जीवंत दस्तावेज भी है। ग्रामीण समाज में चैता गायन सामूहिकता और सांस्कृतिक जुड़ाव का प्रतीक माना जाता है। वास्तव में चैता गायन भारतीय लोकसंस्कृति की अमूल्य धरोहर है।


