हरिओम शर्मा जिले की अर्थव्यवस्था को मजबूती देने में धान और खान उद्योग की अहम भूमिका है। सैंड स्टोन और चावल उद्योग ने न केवल स्थानीय अर्थव्यवस्था को गति दी है, बल्कि हजारों परिवारों की आजीविका का आधार भी बने हुए हैं। कोरोना लॉकडाउन जैसे कठिन दौर में भी ये दोनों उद्योग लगातार चलते रहे। इनके कारण 1 लाख लोगों को रोजगार उपलब्ध कराते हुए जिले की आर्थिक गतिविधियों को मजबूती से थामे रखा। इन उद्योगों ने न केवल स्थानीय लोगों को रोजगार दिया, बल्कि सेंड स्टोन और चावल के निर्यात के माध्यम से देश को विदेशी मुद्रा भी दिलाई। सैंड स्टोन का कारोबार जिले की अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार है। इस उद्योग से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से करीब एक लाख लोगों को रोजगार मिलता है। बूंदी का सैंड स्टोन विदेशों में निर्यात होने से सरकार को विदेशी मुद्रा भी प्राप्त होती है। कोरोना काल में जब अधिकांश उद्योग प्रभावित हुए, तब भी खान उद्योग लगातार चलता रहा। उस समय उद्योग से जुड़े व्यवसायियों ने मजदूरों की मजदूरी 7 से 10 प्रतिशत तक बढ़ाई। लॉकडाउन के दौरान करीब 25 प्रतिशत प्रवासी मजदूर अपने घर लौट गए थे, फिर भी खान उद्योग में लगभग 75 प्रतिशत मजदूरों को लगातार रोजगार मिलता रहा। उस समय जब कई संस्थान मजदूरों को हटाने या मजदूरी कम करने के लिए मजबूर थे, तब खान उद्योग ने मजदूरी बढ़ाकर श्रमिकों का सहयोग किया। राजेश तापड़िया, पूर्व अध्यक्ष, श्रीचावल उद्योग संघ खदानों का 300 व चावल का 1200 करोड़ का टर्नओवर बरड़ क्षेत्र में सैंड स्टोन की 700 से अधिक खानें संचालित हो रही हैं। यहां से निकला पत्थर राजस्थान, पंजाब और हरियाणा सहित अन्य राज्यों व विदेशों तक में भेजा जाता है। खदानों का सालाना टर्नओवर करीब 200 से 300 करोड़ रुपए तक है। वहीं, चावल उद्योग का टर्नओवर लगभग 1200 करोड़ रुपए माना जाता है। दोनों ही उद्योग कई देशों में निर्यात करते हैं। बूंदी का सेंड स्टोन यूरोप और अफ्रीकी देशों में भेजा जाता है, जबकि यहां का चावल खाड़ी देशों में ज्यादातर निर्यात होता है। खनन उद्योग करीब 70 हजार लोगों को रोजगार देता है, जबकि चावल उद्योग में 30 हजार लोग कार्यरत हैं। इस प्रकार दोनों उद्योग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से एक लाख परिवारों की आजीविका का आधार बने हुए हैं। सैंड स्टोन की विशेषताएं बढ़ाती हैं मांग सेंड स्टोन से जुड़े व्यवसायी अशोक जैन ने बताया कि डाबी के सैंड स्टोन की देश-विदेश में मांग इसकी विशेषताओं के कारण है। यह पत्थर मजबूत और टिकाऊ माना जाता है। इसकी डेनसिटी अधिक होने के कारण इसे रफ एंड टफ श्रेणी का पत्थर कहा जाता है और इसकी उम्र करीब एक हजार साल तक बताई जाती है। कम लागत में उपलब्ध होने के कारण गरीब तबका भी इसका उपयोग कर सकता है। बर्फीले क्षेत्रों में इसकी विशेष मांग रहती है।


