सुख सागर और रस मंजरी में इसका वर्णन : ओपी प्रकाश

सतीश कपूर | अमृतसर श्री दुर्ग्याणा तीर्थ की प्रधान प्रो. लक्ष्मी कांता चावला ने मंदिर के पुजारियों और श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर के चेयरमैन को लिखे एक पत्र ने नया विवाद खड़ा कर दिया है। प्रो. चावला ने राधा रानी को ग्वाल बाल की तरह लकड़ा बनाने पर आपत्ति जताई है। उन्होंने इसका प्रमाण भी मांगा है कि इस स्वांग के बारे में हिंदुओं के किस ग्रंथ में लिखा है। बता दें कि दुर्ग्याणा तीर्थ में खिचड़ी भोग के दौरान राधा रानी भगवान श्री नारायण और राम जी के अलग-अलग स्वांग रचाए जाते हैं। इसमें राधा रानी को कृष्ण और श्री नारायण जी को लक्ष्मी का रूप भी धारण करवाया जाता है। वहीं जब प्रो. चावला को इस बारे कॉल की गई तो किसी सिक्योरिटी गार्ड ने उठाया मगर बात करवाता हूं कहकर कॉल कट कर दी। श्री लक्ष्मी नारायण मंदिर के चेयरमैन माधो लाल ने कहा कि हम अपनी मर्जी से भगवान को कुछ नहीं बना सकते। यह सबकुछ तो बड़े बुजुर्गोँ द्व्रारा बनाई परंपरा है। राधा रानी को कृष्ण, नारायण जी को लक्ष्मी और राम जी को सीता का स्वांग रचाकर कोई गलती नहीं की। वहीं मंदिर में सेवा करने वाले पुजारियों को 24 घंटे का व्रत रखकर सेवा दी जाती है। यह परंपरा भी काफी पुरानी है। हमारे ग्रंथ सुख सागर, रस मंजरी और बृज रसिकों में सबकुछ लिखा है। उनमें लिखा है कि किस तरह से गोपियों ने भगवान श्री कृष्ण को राधा रानी और राधा की कृष्ण का रूप धारण करवाया और उनके साथ रासलीला रचाई। इसी तरह भगवान विष्णु ने तो स्वयं मोहिनी रूप धारण किया, जो किसी से छिपा नहीं है। इसी तरह माता सीता जी की सखियों ने प्रभु श्री राम को सीता और सीता जी को प्रभु श्री राम जी का रूप धारण करके उनसे अठखेलियां की। इसका प्रमाण है। इसलिए उन्होंने करीब 45 साल दुर्ग्याणा में श्री ठाकुर जी के अलग-अलग स्वांग रचाए थे। यह कहना कि ऐसा किसी ग्रंथ में नहीं लिखा… यह अज्ञानता है। प्रधान को पहले सुख सागर, रस मंजरी और बृज रसिकों जैसे ग्रन्थों को पढ़ लेना चाहिए। ओम प्रकाश व्यास, दुर्ग्याणा तीर्थ में 45 साल पुजारी की सेवा निभा चुके

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