राजस्थान की जीडीपी में प्रदेश के उद्योग एक तिहाई से ज्यादा का योगदान दे रहे हैं। ग्रोथ का आकलन करें तो यह बेहतर स्थिति में कही जा सकती है। इस योगदान के पीछे सालों-साल से किए जा रहे निवेश और नए उद्यमियों की रुचि महत्वपूर्ण है। ढाई दशक का बदलाव उद्योग को नई करवट देकर गया है। निवेश समिट से और सरकारों की पहल से राजस्थान के लोगों की उद्यमशीलता का असर साफ दिखाई देता है। बजट विशेषज्ञ डॉ मनीष तिवारी के अनुसार करीब 28 साल पहले राज्य का सभी मदों पर कुल व्यय औसतन 2300 करोड़ रुपए था, आज अकेले उद्योग पर यह 2000 करोड़ रु. के आसपास है। रिन्युएबल एनर्जी में सर्वाधिक उम्मीद मार्बल; हर पत्थर की खान राजस्थान सोलर; शून्य से 24000 मेगावाट तक कपड़ा; प्रोडक्ट का नेचर बदल गया राम मंदिर से नई संसद तक पत्थर एमएसएमई; चार गुना बढ़ा करोबार राजस्थान रिन्युएबल एनर्जी में सबसे अधिक संभावना वाला प्रदेश है। केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने कहा है कि आने वाले समय में बसों सहित ज्यादातर चीजें इलेक्ट्रिसिटी पर काम करेंगी। ऐसे में राजस्थान को रिन्युएबल एनर्जी पर फोकस करना चाहिए। पूर्व में विंड टर्बाइन 0.75 मेगावाट का था, आज 2.75 मेगावाट है। अब सोलर पैनल का समय है, जो टर्निंग पॉइंट होगा। मार्बल उद्योग 10 लाख लोगों को रोजगार दे रहा है। राज्य के आधे से ज्यादा जिलों में मार्बल या अन्य पत्थर निकल रहा है या कारोबार हो रहा है। ढाई दशक पहले की स्थितियों में आज बड़ा बदलाव न केवल तकनीक को लेकर आया है, बल्कि इस अपग्रेडेशन में मशीनरी भी जुड़ गई है। अब हर रंग पत्थर की खान बन गया है राजस्थान। राजस्थान में 1996 में सोलर से बिजली उत्पादन शून्य था। केवल ग्रामीण क्षेत्र में सोलर का उपयोग होता था। 2008 में नेशनल पावर मिशन आया और पहली बिड राजस्थान में हुई। आज प्रदेश की इंस्टॉल्ड कैपेसिटी 24 हजार मेगावाट बिजली उत्पादन की है। 2030 तक 1 लाख मेगावाट का टारगेट है। राजस्थान सोलर एसो. अध्यक्ष सुनील बंसल का कहना है कि प्रदेश रिन्युएबल एनर्जी में क्रांतिकारी बदलाव की ओर बढ़ा है। ढाई दशक तकनीकी और सामाजिक-आर्थिक बदलाव का रहा है। इन्फ्रास्ट्रक्चर के साथ उद्योगों में उत्पादन का नेचर बदल गया। कपड़ों की बात करें तो भीलवाड़ा सहित प्रदेश में आमतौर पर रंगाई-छपाई के काम प्रमुख थे। बदले समय ने कपड़े बनाने से लेकर रेडीमेड और डिजाइनर वस्त्रों की शुरुआत की गई। आज देश-दुनिया में एक्सपोर्ट हो रहा है। ढाई दशक पहले तीन-चार तरह के पत्थर मकराना का मार्बल, कोटा स्टोन, करौली-धौलपुर का लाल पत्थर या जोधपुर के छीतर का उद्योग था। मार्बल से ताजमहल और विक्टोरिया मेमोरियल बना। बंसी पहाड़पुर के पत्थर से राम मंदिर सहित कई मंदिर बने। करौली के रेड स्टोन ने लुटियंस दिल्ली को चमकाया। पुरानी संसद या नया भवन, राष्ट्रपति भवन से लेकर सेंट्रल सेक्रेटेरियट तक सब इसी से बना। ढाई दशक में राज्य का उद्योग बड़े सेक्टर से लेकर एमएसएमई तक चार गुना बढ़ा है। असल में राज्य में एमएसएमई उद्योग सबसे ज्यादा रोजगार देने वाला और सबसे अधिक प्रोडक्टिविटी देने वाला है। 1996 में ऐसे छोटे-बड़े करीब 50 हजार उद्योग राज्य में स्थापित थे। उनमें से कुछ बंद भी हो गए, लेकिन आज उनकी संख्या बढ़कर 2 लाख से ज्यादा हो चुकी। ग्रोथ 28 वर्ष पूर्व राज्य का सभी मद पर कुल व्यय 2300 करोड़, आज उद्योग पर ही 2000 करोड़ जीडीपी राजस्थान की जीडीपी में प्रदेश के उद्योग एक तिहाई से ज्यादा का योगदान दे रहे हैं


