छत्तीसगढ़ में विलुप्त हो रही गौरैया को बचाने के लिए महासमुंद के युवाओं ने एक पहल की है। बागबाहरा ब्लॉक के आमाकोनी गांव में चिड़िया के लिए मिट्टी का बसेरा बनाया जा रहा है। गर्मी में पीने के पानी की व्यवस्था की जा रही है। युवाओं ने बताया कि वे बिना किसी सरकारी मदद के गौरैया के संरक्षण के लिए काम करेंगे। ‘दो कदम प्रकृति की ओर’ नाम की समिति के माध्यम से पिछले 9 सालों से यह अभियान चल रहा है। बता दें कि, महासमुंद वन विभाग ने भी गौरैया के संरक्षण के लिए 4 साल पहले अभियान चलाया था, जिसके तहत जिले भर में बसेरा (घोसला) बनाने अनेक कार्यशाला आयोजित किए गए, लेकिन अब यह अभियान बंद हो गया। बसेरों का नि:शुल्क वितरण समिति के संचालक संजय साहू पेशे से फार्मासिस्ट हैं। वे गौरैया के लिए विशेष बसेरे बनवाते हैं और नि:शुल्क वितरित करते हैं। उनका कहना है कि छत्तीसगढ़ में जंगलों की कटाई, वनों की बर्बादी और बढ़ती आबादी ने पक्षियों का प्राकृतिक आवास छीन लिया है। संजय की टीम गौरैया के संरक्षण के लिए गरियाबंद, छुरा, राजिम जागरूकता अभियान चला कर गांव में मिट्टी का बसेरा लगाने का काम कर रही हैं। मिट्टी के बसेरे बनाए जाते है संजय साहू के बनाए गए बसेरा की खासियत यही है कि ये मिट्टी के बनाते हैं। जिसको गौरैया सहज ही अपने आशियाने के रूप में स्वीकार कर लेती है और रहने लगती है। कई राज्यों के लोग मंगवा रहे छत्तीसगढ़ के अलावा केरल, महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश, झारखंड, चंडीगढ़ जैसे राज्य से लोग सोशल मीडिया के जरिए बसेरा मंगवा रहे हैं। वन विभाग भी समय-समय पर चलाता है अभियान महासमुंद वन विभाग समय-समय पर संरक्षण अभियान चलाता है। लेकिन गौरैया अब दुर्लभ होती जा रही है। वन विभाग के अधिकारी भी मानते हैं कि गौरैया एक संवेदनशील पक्षी है, अगर इन पक्षियों के संरक्षण की दिशा पर कोई काम कर रहे हैं तो उल्लेखनीय काम कर रहे हैं। पिछले 9 सालों से कर रहे सरंक्षण का काम दो कदम प्रगति की ओर समिति में 25 सदस्य टीम मिलकर पिछले 9 सालों से विलुप्त हो रहे गौरैया के संरक्षण का काम कर रही हैं। इसके पीछे की वजह है कि लोगों का रहन-सहन और बदलते परिवेश के कारण गौरैया मानव जीवन से दूर होते जा रही है। इस समिति के युवाओं ने ना सिर्फ गौरैया बल्कि जंगली गौरैया, मैना, रोविन, सिल्वर बिल, मुनिया, बसंता जैसी पक्षियों का संरक्षण करने में जुटे हैं। गौरेया और मानव की दूरी को कम करना मकसद इस काम का मुख्य मकसद मानव और गौरैया के बीच बढ़ती दूरी को कम करना है। साथ ही यह भी मानना है कि फसलों में कीटनाशक दवा का छिड़काव भी गौरैया के विलुप्ति का कारण बनता जा रहा हैं।


