गौरेला पेंड्रा मरवाही जिले के दानीकुंडी और बंशीताल गांवों में बिदरी त्योहार मनाया गया। गुरुवार को ग्रामीण अपने घरों से धान की टोकरी लेकर देवस्थल पहुंचे। जहां पंडा ने आधा धान देवता को अर्पित किया और बाकी किसान को लौटा दिया। अच्छी फसल और समृद्धि के लिए किसान देवस्थल के चारों ओर धान बोते हैं और नागर से हाथों से जुताई करते हैं। बिदरी के दिन पानी भरने, निर्माण कार्य या मिट्टी खोदने पर प्रतिबंध रहता है। इन नियमों का उल्लंघन करने पर जुर्माना लगाया जाता है। धान के कोढ़े का होता है छिड़काव यह परंपरा होली के बाद कृष्ण पक्ष में मनाई जाती है। इस दिन गांव में कुछ विशेष नियमों का पालन किया जाता है। गांव में एक दिन पहले ही मुनादी कर दी जाती है। धान के कोढ़े का छिड़काव भी किया जाता है। इससे जंगलों में रुगड़ा, पूटु, छतनी और मशरूम जैसे कीमती खाद्य पदार्थ प्राकृतिक रूप से उगते हैं। यह त्योहार जाति-धर्म से ऊपर है और सभी लोग इसमें भाग लेते हैं। गांव की समृद्धि का प्रतीक है ये त्योहार बिदरी का मुख्य उद्देश्य ग्रामीणों को प्रकृति से जोड़ना है। इस परंपरा के बाद किसान खेती के लिए तैयार हो जाते हैं। यह त्योहार अच्छी फसल और गांव की समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। पूजा के बाद खेती शुरू करते है ग्रामीण ग्रामीणों का कहना है कि इस त्योहार के बाद खेती की शुरुआत होती है। यदि इस पूजा के बिना खेती की शुरुआत की गई तो निश्चित ही कोई न कोई बाधा इनके सामने आ खड़ी होगी और सूखा या अतिवृष्टि के चलते फसलों का नुकसान भी हो सकता है।


