झारखंड भारत के प्राकृतिक समृद्ध राज्यों में से एक है, जहां कभी पानी की कमी नहीं हुई और यहां की हरियाली के कारण धरती व प्रकृति भी सदैव प्रसन्न रहें। जब तक यहां का प्राकृतिक संरक्षण बरकरार रहा, तब तक यह राज्य पानीदार था। जब से यहां की प्राकृतिक लूट मची, धरती के ऊपर की हरियाली मिटी और यहां की लाल गर्मी बढ़ी। इससे यहां बादलों का आना और बेमौसम बरसना या रूठकर बिना बरसे चला जाना देखा जा रहा है। इसका परिणाम हुआ कि नई तकनीक ने धरती के पेट को खाली करने के लिए हजार फीट बोरिंग की और इन हजारों-हजार बोरिंग होने से झारखंड की धरती का पेट खाली हो गया। जो समय के साथ दोबारा नहीं भरा। हरियाली होगी तो समुद्र से आने वाले बादल नहीं रूठेंगे झारखंड की पहाड़ियों को हरा-भरा बना कर रखना होगा। हरियाली होगी तो समुद्र से आने वाले बादल रूठ कर नहीं जाएंगे। जब बादल बरसे तो बरसा हुआ पानी जो दौड़ कर चला जाता है, उसको रेंगना सिखाना पड़ेगा। धरती माता के खाली पेट में पानी बैठाने के लिए जंगल, तालाब, झाल, पाल, ताल सब बनाना पड़ेगा ताकि वह फिर से रिचार्ज हो। झरनों को पुनर्जीवित करना होगा। नदियों से बालू निकालना बंद हो झारखंड के औद्योगीकरण ने गलत तरीके से सारे जल स्रोतों को दूषित कर दिया है। यहां की नदियों से बालू निकालने का काम बहुत ही अवैधानिक तरीके से हो रहा है। नदी का बालू नदी के पानी को शुद्ध करता है। नदियों की बालू नहीं निकाला जाना चाहिए। स्कूलों-गावों में जल साक्षरता कैंपेन चले झारखंड को पानीदार बनाए रखने के लिए झारखंड में जल साक्षरता अभियान की जरूरत है। यहां के लोग अनुशासित होकर पानी का उपयोग करें। राजस्थान में पानी की साक्षरता की यात्राएं निकाली थीं, वैसी ही यात्रा यहां स्कूलों-गांवों में होनी चािहए। सुझाव-झारखंड, बंगाल व बिहार जल संबंधी समझौते पर पुन: विचार करे मैंने झारखंड की खोज यात्रा शुरू की थी। शोध में यह बात साफ निकल कर आई थी कि झारखंड एक पानीदार राज्य है, लेकिन झारखंड, बंगाल और बिहार का जो दामोदर नदी का समझौता था, उसके कारण झारखंड और बिहार दोनों का पानी ज्यादातर बंगाल में चला जाता है। बंगाल पानी के कारण डूबता है और झारखंड और बिहार में पानी की कमी हो जाती है। दामोदर वैली के रिसर्च के बाद मैं तीनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों से मिला। तीनों राज्यों को हमने यह समझाने की कोशिश की थी कि इस समझौते को पुनर्विचार करना चाहिए।


