पतली पगडंडी, चारों तरफ जंगल, पतझड़ का मौसम, खड़ी पहाड़ी और पहाड़ी की चोटी में नक्सलियों का ठिकाना…19 मार्च की रात पहाड़ के नीचे जवान पहुंचे, 20 मार्च की सुबह नक्सलियों ने गोलियां बरसानी शुरू की। जवानों ने 10 घंटे तक पहाड़ को घेरा। कंधे पर 25 किलो का वजह ढोकर गोलियों की बौछार के बीच चढ़ाई चढ़े। नक्सलियों के सबसे सुरक्षित ठिकाने में घुसकर 26 लड़ाकों को मार गिराया। मुठभेड़ इतनी भीषण थी कि एंड्री, मुतवेंडी और लोहा गांव तक गोलियों की तड़तड़ाहट सुनाई दी। दरअसल, दंतेवाड़ा और बीजापुर जिले की सरहद पर बैलाडीला की पहाड़ियों के पीछे एंड्री गांव बसा हुआ है। 20 मार्च से पहले तक इस इलाके को नक्सलियों की पश्चिम बस्तर डिवीजन कमेटी अपना सबसे सुरक्षित पनाहगाह मानती थी। उन्हें पूरा विश्वास था कि यहां तक फोर्स नहीं पहुंच सकती। यहां पहुंचने की राह भी आसान नहीं है। लेकिन, सरेंडर नक्सली दिनेश के दिए सटीक इनपुट और पतझड़ के मौसम दिखी साफ विजिबिलिटी और जवानों की स्ट्रैटजी ने नक्सलियों के अभेद किले को भेद दिया। 93 लाख रुपए के इनामी माओवादियों का एनकाउंटर कर दिया। मौके पर गोलियों के खोखे, खून के धब्बे और नक्सल स्मारक भी जिस जगह पर मुठभेड़ हुई वहां जगह-जगह खून के धब्बे मिले। गोलियों के खोखे बिखरे पड़े थे। पेड़ों पर गोलियों के निशान देख अंदाजा लगाया जा सकता है कि मुठभेड़ काफी भीषण थी। इसके अलावा पहाड़ चढ़ने से पहले नक्सलियों के 4 शहीदी स्मारक भी दिखे। यह इस बात का प्रमाण है कि इलाका नक्सलियों का आधार क्षेत्र था। ग्रामीण बोले- मुठभेड़ भीषण थी उस इलाके के ग्रामीणों ने मुठभेड़ के बारे में बताया। हालांकि, उन्हें नक्सलियों का डर है इसलिए कैमरे के सामने आने से मना कर दिया। गांव वालों ने कहा कि, मुठभेड़ काफी भीषण थी। सुनसान जगह है इसलिए करीब 2 से ढाई किलोमीटर तक गोलियों की आवाज सुनाई दी। डर की वजह से परिवार के सदस्य घर से बाहर नहीं निकले। हर एक जवान के शरीर पर 25 किलो का वजन गर्मी और पतझड़ के मौसम में जवानों की मुश्किलें और बढ़ जाती हैं। ऑपरेशन पर निकलने वाला हर एक जवान शरीर पर लगभग 25 किलो वजन लेकर चलता है। 5 से 6 किलो की गन, गोलियां, राशन सामान और पानी की बोतलें साथ रखते हैं। साथ ही हैवीवेट के जूते और वर्दी भी होती है। एंड्री में 25 किलो वजन लेकर जंगलों की खाक छानना और पहाड़ चढ़कर नक्सलियों को मारना जवानों के लिए काफी चुनौतीपूर्ण था। 3 तरफ से घेरा एंड्री इलाके को जवानों ने तीन तरफ से घेर रखा था। इसमें बीजापुर जिले से DRG, STF, CRPF, बस्तर फाइटर्स की टीम निकली थी। सुकमा से DRG और दंतेवाड़ा जिले से CAF के जवान ऑपरेशन पर निकले थे। तीनों तरफ से घिरे होने के कारण बड़ी संख्या में नक्सली मारे गए। मारे गए नक्सलियों में 14 महिला और 12 पुरुष हैं। अब जानिए कैसा है इलाका एंड्री में ऐसे बना नया ठिकाना राशन के लिए गांव पर डिपेंड थे नक्सली नक्सली राशन के लिए एंड्री, पीडिया और लोहा गांव पर डिपेंड थे। यहां ग्रामीणों पर दबाव बनाते और राशन लेकर जाते थे। ज्यादातर राशन एंड्री से ही पहुंचता था। ये हैं चर्चित बड़े लीडर फैक्ट फाइल मुठभेड़ में एक जवान शहीद दोनों तरफ से हुई गोलीबारी में बीजापुर DRG का एक जवान राजू भी शहीद हो गया। बस्तर IG सुंदरराज पी के मुताबिक, यह सरेंडर नक्सली था। माओवाद संगठन का हथियार छोड़ने के बाद इसने दोबारा देश की रक्षा के लिए हथियार उठाए थे। नक्सलियों से लड़ते हुए जवान ने अपनी शहादत दी। पतझड़ में ऑपरेशन करना होता है कठिन 1 मार्च से जून के पहले सप्ताह तक नक्सलियों का TCOC महीना चलता है। पतझड़ के मौसम में जवानों को ऑपरेशन के दौरान मुश्किल होती है। क्योंकि जंगलों में सूखे पत्ते जमीन पर गिरे रहते हैं। उस पर एक साथ चलने से आवाज आती है। जंगल में सन्नाटे के बीच नक्सलियों को इस बात का अंदेशा हो जाता है कि जंगल में कुछ सुगबुगाहट है। जिससे वे पहले से ही अलर्ट हो जाते हैं। इसके अलावा विजिबिलिटी साफ होती है। दूर से आता हुआ व्यक्ति भी दिख जाता है। हालांकि जवानों को काफी सावधानी पूर्वक ऑपरेशन करना होता है।


