महात्मा गांधी मेमोरियल मेडिकल कॉलेज:रैगिंग की बुराई सालों से, लेकिन डीन, प्रोफेसर, वार्डन न देख रहे, न बोल रहे, न सुन रहे

एमजीएम मेडिकल कॉलेज में रैगिंग की शिकायत नेशनल एंटी रैगिंग कमेटी तक पहुंच गई है। गुरुवार को दिल्ली से एक पत्र डीन को मिला। इसमें रैगिंग मामले की जांच कर 24 घंटे में रिपोर्ट भेजने के लिए कहा है। चार सीनियर छात्रों का नाम सामने आया है। मेडिकल कॉलेज प्रशासन यही कहता रहा कि कोई छात्र नहीं कह रहा है कि उनके साथ रैगिंग हो रही है। प्रोफेसर भी यही कहते रहे कि सोशल मीडिया पर हुई शिकायत के आधार पर कार्रवाई कैसे कर सकते हैं। दरअसल, मामले में वर्ष 2018 और 2019 के चार छात्रों के नाम सामने आए हैं। उन्हें दोपहर में एंटी रैगिंग कमेटी ने बुलवाया। सभी ने रैगिंग में लिप्त रहने से इनकार किया है। एक छात्र ने दावा किया कि वह वर्ष 2019 से ही हॉस्टल में नहीं रहा है। छात्रों द्वारा इनकार किए जाने के बाद कॉलेज की एंटी रैगिंग कमेटी ने लिखकर दे दिया कि कोई छात्र रैगिंग में लिप्त नहीं है। उधर, एसडीएम निधि वर्मा और प्रशासन की टीम गुरुवार दोपहर कॉलेज पहुंची। डीन डॉ. निलेश दलाल और हॉस्टल वार्डनों से बात की। सीसीटीवी कैमरों की व्यवस्था करने और हॉस्टल के लिए अलग से मैनेजर नियुक्त करने पर भी चर्चा की गई। तीन सीनियर होस्टल में रहते, जवाब भी एक जैसा ही दिया जिन चार सीनियर छात्रों के नाम सामने आए हैं, उनमें से तीन हॉस्टल में रहते हैं और वर्ष 2018 बैच के छात्र हैं। एंटी रैगिंग कमेटी को तीनों ने एक जैसा जवाब दिया है। जवाब में लिखा कि ‘मैं वर्ष 2018 का छात्र हूं। मैं पीजी की तैयारी में व्यस्त हूं तो मेरा ज्यादा समय हॉस्टल के बाहर ही जाता है। ऐसी किसी शिकायत की जानकारी नहीं है। न मैंने कभी रैगिंग होते देखा। हॉस्टल में इस तरह का वातावरण ही नहीं है। सब सीनियर-जूनियर मिलकर रहते हैं।’ 2 साल में 8 शिकायतें, समिति ने रैगिंग नहीं होने की रिपोर्ट दी एंटी रैगिंग कमेटी की अनुशंसाएं एसजीएसआईटीएस : सख्त कदम उठाए, नतीजा- रैगिंग रुकी एक महिला डॉक्टर ने बताया मैं हॉस्टल में रहती थी। शिकायत करना भारी पड़ा। सीनियर प्रोफेसर भी परेशान करने लगे। स्थिति यह हो गई थी कि कई महीनों तक डिप्रेशन में रही। सुसाइड के ख्याल आने लगे थे। हॉस्टल में यह हर साल की परंपरा है। वहीं एक छात्र ने बताया कि हॉस्टल में अकेले कहीं जाने की आजादी नहीं थी। वॉशरूम में भी अकेले नहीं जा सकते। कभी मुर्गा बनाते तो कभी रात को 2 बजे तक खड़ा रखते। साथ के बच्चों से ही चांटे पड़वाए गए। नजर उठाएं तो मार पड़ती थी। कोई सीनियर अगर कुछ कहता तो सिर्फ सॉरी सर ही कह सकते थे। जूते तक नहीं उतारने देते थे। इसलिए एंटी फंगल पावडर साथ रखना पड़ता था। जूनियर विंग में सवा दो सौ से ज्यादा छात्र रहते हैं। हर माह कम से कम पांच से सात बार विजिलेंस टीम औचक निरीक्षण करती है। – रात 9 बजे यहां जूनियर छात्रों की विंग लॉक कर दी जाती है। छात्रों को सवा 8 बजे होस्टल पहुंचना अनिवार्य होता है। एमजीएम : सुरक्षा के नाम पर सिर्फ एक गार्ड, कैमरे तक नहीं एक समय रैगिंग के लिए कुख्यात माने जाने वाले प्रदेश के सबसे बड़े इंजीनियरिंग इंस्टिट्यूट एसजीएसआईटीएस ने इस पर काफी हद तक काबू पा लिया है। पिछले 5 सालों में यहां रैगिंग की सिर्फ 3 घटनाएं सामने आई हैं। उसमें भी सख्त कार्रवाई करते हुए 10 सीनियर को एक विषय से लेकर एक सेमेस्टर तक के लिए बाहर किया गया। संस्थान के सीनियर प्रोफेसर डॉ. संदीप नारुलकर बताते हैं कि रैगिंग को लेकर पिछले कुछ सालों में हमने चार-पांच अहम व बड़े कदम उठाएं हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि रात 9 बजे हर हाल में जूनियर विंग पूरी तरह लॉक कर दी जाती है। सिर्फ इमरजेंसी को छोड़ बाकी किसी को बाहर जाने की या किसी को वहां आने की अनुमति नहीं है।

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