वनाधिकार अधिनियम पर रोक से प्रभावित होंगे 17 लाख लोग:सुप्रीम कोर्ट में लंबित है मामला, अमरजीत बोले- उद्योगपतियों को जमीन देना चाहती है सरकार

केंद्रीय अधिनियम 2006 को समाप्त करने की मांग को लेकर साल 2020 में एक संस्था ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई। जिस पर सुनवाई चल रही है। साल 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने कई संस्थाओं की याचिका पर सुनवाई करते हुए 2017 के बाद आए प्रकरणों को इंक्रोचमेंट घोषित करने का आदेश दिया। हालांकि विरोध के बाद इस पर रोक लगा दी गई। अमरजीत भगत ने कहा कि, यूपीए शासित राज्यों ने इसका विरोध किया था। अधिनियम को समाप्त किया गया तो छत्तीसगढ़ समेत देशभर के 17 लाख लोग प्रभावित होंगे। दरअसल, बर्ड लाइफ फर्स्ट संस्था ने वन अधिकार अधिनियम 2006 को खत्म करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई है। अमरजीत भगत ने कहा कि, साल 2006 में वन अधिकार अधिनियम के तहत वनभूमि पर काबिज लोगों को व्यवस्थापन किया गया था। उन्हें वन अधिकार पत्र का पट्टा दिया गया। इससे लाखों लोगों को फायदा मिला। 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने लगाई थी रोक अमरजीत भगत ने बताया कि, कुछ संगठनों और संस्थाओं ने इस अधिनियम पर रोक लगाने का आग्रह करते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। साल 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने साल 2017 के बाद आए प्रकरणों को इंक्रोचमेंट घोषित करने का आदेश जारी किया। इसे लेकर पूरे देशभर में प्रदर्शन हुए तो इस आदेश पर रोक लगा दी गई। इसमें समीक्षा के लिए राज्य सरकारों को निर्देश दिया गया। अधिनिमय को समाप्त करने की याचिका लंबित अमरजीत भगत ने बताया कि, साल 2020 में बर्ड लाइफ फर्स्ट संस्था ने वन अधिकार अधिनियम 2006 को समाप्त करने की याचिका सुप्रीम कोर्ट में लगाई। इससे वनभूमि पर काबिज करीब 17 लाख लोगों का भविष्य अधर में दिख रहा है। इसमें छत्तीसगढ़ के आदिवासी समुदाय के लोग शामिल हैं। अमरजीत भगत ने बताया कि, पूर्व में सुप्रीम कोर्ट में छत्तीसगढ़ की भूपेश सरकार सहित यूपीए शासित राज्यों की सरकारों ने सुप्रीम कोर्ट में वन अधिकार अधिनिमय को जारी रखने के लिए पक्ष रखा था और पार्टी बने थे। भाजपा शासित राज्यों ने इससे किनारा कर रखा था। अमरजीत भगत ने दावा किया कि केंद्र की भाजपा सरकार चाहती है कि यह कानून समाप्त हो, ताकि जमीनें उद्योगपतियों को दिया जा सके। हजारों लोगों को मिला है अधिकार पत्र वन अधिकार अधिनियम के तहत वर्षों से काबिज आदिवासी एवं गैर आदिवासी हजारों लोगों को वन अधिकार पत्र दिया गया है। छत्तीसगढ़ में वन अधिकार पत्र प्राप्त करने वाले लोगों को समर्थन मूल्य पर धान और अन्य उपज भी बेचने का प्रावधान किया गया है। वन अधिकार पत्र शुरू से विवादों में रहा है, क्योंकि वन अधिकार के लिए जंगलों का सफाया कर दिया गया और वनभूमि पर कब्जा कर वन अधिकार पत्र बनवा लिया गया है।

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