राज्य में शिशु मृत्यु दर और मातृत्व मृत्यु दर केंद्रीय औसत से भी कम

हर साल 7 अप्रैल को दुनियाभर में ‘वर्ल्ड हेल्थ डे’ यानी विश्व स्वास्थ्य दिवस मनाया जाता है। यह दिन हम सभी के लिए एक खास संदेश लेकर आता है, क्योंकि सभी के लिए ‘सेहत ही सबसे बड़ी पूंजी’ है। इस बार, 2025 के लिए यह थीम ‘स्वस्थ शुरुआत, आशाजनक भविष्य’ रखा गया है। यह विषय मुख्य रूप से मां और नवजात बच्चों की सेहत और सुरक्षा पर ध्यान देता है। इसका मकसद यह बताना है कि गर्भावस्था, बच्चे के जन्म और उसके बाद की देखभाल के दौरान अच्छी सेवाओं की कितनी जरूरत है, ताकि मां और नवजात शिशुओं की मौत के आंकड़ों को कम किया जा सके। झारखंड के लिए सुखद बात यह है कि झारखंड में शिशु मृत्यु दर और मातृत्व मृत्यु दर केंद्रीय औसत से बेहतर यानी कम है। एसआरएस 2020 के तहत झारखंड में शिशु मृत्यु दर प्रति हजार पर 25 है, जबकि केंद्रीय सूचकांक 28 है। झारखंड में मातृत्व मृत्यु दर 56 है। जबकि, केंद्रीय स्वास्थ्य सूचकांक 97 है। झारखंड में नवजात शिशु मृत्यु दर 17 है। जबकि केंद्रीय सूचकांक में यह आंकड़ा 20 है। केंद्रीय संयुक्त सचिव भी कर चुके हैं तारीफ झारखंड ने मातृत्व मृत्यु दर, शिशु मृत्यु दर, नवजात मृत्युदर के मामले में सतत विकास लक्ष्य को न सिर्फ तय समय से पहले हासिल कर लिया है, बल्कि राष्ट्रीय औसत से भी आगे है। राज्य की इस उपलब्धि पर केंद्रीय संयुक्त सचिव भी स्वास्थ्य अधिकारियों की सराहना कर चुके हैं। एनीमिक महिलाओं की स्थिति सुधारना जरूरी झारखंड में एनीमिया (खून की कमी) पीड़ित महिलाओं की स्थिति ठीक नहीं है। एनएफएचएस की रिपोर्ट की मानें तो राज्य में एनीमिया पीड़ित 65.3% महिलाएं हैं। रिपोर्ट के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्र में 66.7 % और शहर में 61.1 % महिलाएं खून की कमी से पीड़ित हैं। देवघर, दुमका, गढ़वा व साहिबगंज में सबसे अधिक एनिमिक महिलाएं है। झारखंड में अभी भी चिकित्सकों की कमी झारखंड में स्वास्थ्य की आधारभूत संरचनाओं के साथ-साथ डॉक्टरों की अभी भी काफी कमी है। देश की तुलना में झारखंड अब भी काफी पीछे है। देश में जहां 834 लोगों पर एक डॉक्टर है, वहीं, झारखंड में 3000 लोगों पर एक डॉक्टर उपलब्ध हैं। जबकि, डब्ल्यूएचओ के मानक के अनुसार 1000 लोगों पर एक डॉक्टर होना चाहिए।

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