बढ़ती उम्रदराज आबादी को देखते हुए नीति बनाई जानी चाहिए, बुजुर्गों को आगे बढ़ने के लिए सशक्त बनाना होगा

जेवियर इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल सर्विस और भारत सरकार के सामाजिक न्याय व अधिकारिता मंत्रालय के अंतर्गत आने वाले राष्ट्रीय सामाजिक रक्षा संस्थान (एनआईएसडी) के सहयोग से कैंपस में गुरुवार को ‘वृद्धावस्था: एक वरदान या बोझ’ शीर्षक पर दो-दिवसीय राष्ट्रीय कार्यशाला शुरू हुई। कार्यशाला में वृद्धावस्था की चुनौतियों और अवसरों की दोहरी वास्तविकताओं पर चर्चा की गई। निदेशक डॉ. जोसफ मारियानुस कुजूर एसजे ने कहा कि वृद्धावस्था एक अपरिवर्तनीय वास्तविकता है और हमारी संस्कृति और मूल्यों का अभिन्न अंग है। समन्वयक डॉ. संत कुमार ने भारत की बढ़ती उम्रदराज आबादी को देखते हुए नीतिगत हस्तक्षेप और सामुदायिक सहभागिता की आवश्यकता को रेखांकित किया। प्रो. डॉ. रीता कुमारी ने बुजुर्गों के लिए सहायता प्रणाली प्रदान करने में गैर सरकारी संगठनों की भूमिका पर चर्चा की। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि बुजुर्गों को केवल जीवित रहने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें आगे बढ़ने के लिए सशक्त बनाना चाहिए। कार्यक्रम में वरिष्ठ नागरिकों के लिए राज्य सरकार द्वारा चलाए जा रहे कल्याणकारी उपायों पर चर्चा की। रूरल मैनेजमेंट के प्रमुख डॉ. अनंत कुमार ने वरिष्ठ नागरिक संघ कैसे सक्रिय वृद्धावस्था को बढ़ावा देते हैं, इस पर चर्चा की। झारखंड के बुजुर्गों में बीमारी की दर राष्ट्रीय औसत से कम 2011 की जनगणना के अनुसार, झारखंड में 23.56 लाख वरिष्ठ नागरिक हैं, जो आबादी का 8.4% हिस्सा हैं। 60 वर्ष की आयु में जीवन प्रत्याशा पुरुषों के लिए 18.1 वर्ष व महिलाओं के लिए 16.8 वर्ष है। वृद्धावस्था निर्भरता अनुपात 12.7 है, जिसमें ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक बोझ है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में 71% बुजुर्ग महिलाएं और 23% पुरुष, तथा शहरी क्षेत्रों में 66% बुजुर्ग महिलाएं और 28% पुरुष पूरी तरह से आर्थिक रूप से आश्रित हैं। यह भी देखा गया है कि झारखंड के बुजुर्गों में स्व-अनुभूत बीमारी की दर राष्ट्रीय औसत से कम है।

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