पीबीएम में मरीज कितने सुरक्षित:बिल्डिंग की फायर और सेफ्टी ऑडिट कभी हुई ही नहीं, अग्निशमन यंत्र भी एक्सपायर

संभाग का सबसे बड़ा पीबीएम हॉस्पिटल सुरक्षा मानकों पर खरा नहीं उतर पा रहा है। फायर सेफ्टी ऑडिट के लिए डीपीआर अब तक नहीं बनी और बिल्डिंग की सेफ्टी ऑडिट कभी करवाई ही नहीं गई। यही कारण है कि अचानक कोई घटना होने पर भगदड़ के हालात बन जाते हैं और मरीजों की जान पर बन आती है। पीबीएम हॉस्पिटल के चर्म, रति एवं कुष्ठ रोग विभाग के प्रथम तल पर एचओडी कक्ष के एसी में हाल ही में आग लग गई थी। इससे पहले भी आग लगने की कई घटनाएं हो चुकी हैं। इन्हें देखते हुए भास्कर एक्सपर्ट ने पीबीएम हॉस्पिटल की प्रमुख बिल्डिंग्स की सेफ्टी ऑडिट की तो काफी खामियां नजर आईं। पीबीएम की मेन बिल्डिंग की छत कई जगह से पानी भरने के कारण डैमेज हो चुकी है। एक्स वार्ड और उसके सामने गैलरी में सुरक्षा की दृष्टि से लोहे के एंगल लगाए गए हैं। सी वार्ड के बाहर पट्टियां टूटी पड़ी हैं, जिन्हें एंगल से रोका हुआ है। इसी वार्ड के टॉयलेट की छत पिछले साल गिर पड़ी थी। उसे अब तक रिपेयर नहीं करवाया जा सका। इसके कारण एफ वार्ड का टॉयलेट भी बंद है। वार्डों के बाहर लगे अग्निशमन यंत्र अवधिपार हो चुके हैं। पिछले साल फरवरी में नए लगाए गए थे। सबसे अहम बात ये है कि मेन बिल्डिंग में मरीजों के लिए दो ही रैंप हैं। उनके फर्श भी उखड़े हुए हैं। ऑपरेशन के बाद शिफ्टिंग के दौरान या जांच के लिए जाते समय मरीज दर्द से कराह उठते हैं। मेन बिल्डिंग में लिफ्ट खराब पड़ी है। मरीजों को लाने ले जाने में काफी परेशानी उठानी पड़ती है। स्ट्रेचर खींचने के लिए अटेंडेंट की कोई व्यवस्था नहीं है। पीबीएम प्रशासन ने बिजली का खर्च बचाने के लिए छतों पर सोलर प्लेटें लगवा कर काम तो अच्छा किया, लेकिन प्लेटों की हाइट फर्श से मात्र डेढ़-दो फीट ही रखी, जिससे कचरा और बारिश का पानी छत पर जमा होने लगा है। सफाई कभी होती नहीं। इससे छत के क्षतिग्रस्त होने की संभावना बढ़ गई है। पुरानी बिल्डिंग में पट्टियां क्रेक होना आम बात है। ग्राउंड फ्लोर पर उखड़ी हुई छतों को फॉल्स सीलिंग से ढक दिया गया है, जबकि जरूरत ही नहीं थी। सरकारी बिल्डिंग्स में सेफ्टी ऑडिट का नियम नहीं
हादसे सरकारी बिल्डिंग्स में ही ज्यादा होते हैं और उन्हीं की सेफ्टी ऑडिट के लिए कोई नियम ही नहीं है। पीडब्ल्यूडी के रिटायर्ड एसई मुकेश गुप्ता बताते हैं कि सरकार ने सरकारी स्कूलों के लिए सेफ्टी ऑडिट के नियम बना रखे हैं, लेकिन सरकारी अस्पतालों के लिए ऐसा कोई नियम नहीं है। अस्पताल प्रशासन के मांग करने पर संबंधित बिल्डिंग या स्थान की ऑडिट कराई जा सकती है। आजकल निर्माण एजेंसियों भी काफी हो गई हैं। पीडब्ल्यूडी के अलावा यूआईटी, एनएचएम, आरएसआरडीसी भी सरकारी अस्पतालों में निर्माण कार्य करवाती है। पीबीएम हॉस्पिटल का निर्माण रियासतकाल में हुआ था। बिल्डिंग को डिजायन ही ऐसा है, जिससे वेंटिलेशन की कोई समस्या नहीं है। अब नई बिल्डिंग्स आर्किटेक्चर से डिजायन कराई जाती हैं। हालांकि सभी तरह के सुरक्षा मानकों का ध्यान रखा जाता है। नई बिल्डिंग्स में फायर सिस्टम अनिवार्य कर दिया गया है। यह सिस्टम पुरानी बिल्डिंग में भी होना चाहिए। आग लगने की बड़ी घटनाएं
1. चर्म, रति एंव कुष्ठ रोग विभाग के एचओडी कक्ष में एसी में आग लगी। बिल्डिंग खाली करानी पड़ी।
2. मेडिसिन आईसीयू के पीछे बिजली के तारों में आग लग गई थी। मरीजों की जान पर बन आई। कई दिनों तक आईसीयू बंद रहा।
3. ऑपरेशन थिएटर में एसी में शॉर्ट सर्किट होने से आग लगने की घटना हो चुकी है।
4. बच्चा अस्पताल की नर्सरी में कुछ साल पहले आग लग गई थी। सैन्यकर्मियों ने बच्चों को सुरक्षित बाहर निकाला था। एक्सपर्ट – नरेश जोशी, एक्सईएन, पीडब्ल्यूडी(रि.) – पीबीएम में सुरक्षा मानक पूरे नहीं
पीबीएम हॉस्पिटल की मुझे याद नहीं कि कभी सेफ्टी ऑडिट कराई गई हो। लेकिन यह गंभीर विषय है। क्योंकि काफी नए निर्माण हो चुके हैं। मेन बिल्डिंग सौ साल पुरानी है, जहां फायर सिस्टम तक नहीं है। सुरक्षा मानकों का ध्यान नहीं रखा गया है। बिजली के तार और पैनल खुले पड़े हैं। बच्चा अस्पताल के पीछे हॉस्टल जर्जर हालत में है। पूरा परिसर किसी भूल-भुलैया से कम नहीं है। कहीं पर भी पीबीएम का नक्शा नहीं है, जिससे यह पता नहीं चलता कि किस विभाग की बिल्डिंग कहां पर है। वार्ड और लैब की जानकारी के लिए मरीजों को भटकना पड़ता है। बाहर से आने वाले मरीजों को काफी परेशानी उठानी पड़ती है। सभी वार्डों में टीवी स्क्रीन तो लगा दी, लेकिन उसमें भी विभागों का नक्शा फीड नहीं किया गया। लिफ्ट खराब होने पर मरीज को ले जाने के लिए रैंप तक का पता पूछना पड़ता है। ऑडिट के दौरान मिली खामियां तरफ एक्जिट है, जो खतरनाक है। वर्जन – यह सही है कि पीबीएम हॉस्पिटल की फायर और सेफ्टी ऑडिट नहीं हुई है। इसके लिए पीडब्ल्यूडी को लिखा जा चुका है। पुरानी बिल्डिंग में फायर सिस्टम इंस्टालेशन करना आसान नहीं है। इसके लिए डीपीआर बननी है, जो बिना ब्लू प्रिंट के संभव नहीं है। किसी आर्किटेक्चर से इसका ब्लू प्रिंट तैयार करवाया जाएगा।
डॉ. गौरीशंकर जोशी, उप अधीक्षक एवं नोडल अधिकारी आपदा प्रबंध

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