वीर गंगा नारायण सिंह ने अंग्रेजों से सालभर लड़ी थी लड़ाई

सुशील अग्रवाल | जादूगोड़ा चुआड़ (भूमिज) विद्रोह के नायक वीर शहीद गंगा नारायण सिंह की 235वीं जयंती पर शुक्रवार को उन्हें याद किया जाएगा। उनका जन्म 25 अप्रैल 1790 को बांधडीह गांव में हुआ था। यह गांव नीमडीह प्रखंड में है। उनके पिता लक्ष्मण सिंह बड़ाभूम के भूमिज राजा वंश से थे। माता का नाम ममता देवी था। अंग्रेजों के उत्तराधिकार कानून के कारण उनके पिता को गद्दी से वंचित कर दिया गया। जबकि वह पटरानी के पुत्र थे और असली हकदार थे। अंग्रेजों ने बड़े बेटे को उत्तराधिकारी मानने का नियम लागू किया। लक्ष्मण सिंह को प्रजा का समर्थन मिला, फिर भी कंपनी सरकार की मदद से विरोधी पक्ष जीत गया। गंगा नारायण सिंह जब बड़े हुए तो बड़ाभूम की गद्दी को लेकर फिर विवाद हुआ। उन्होंने राजा गोविंद सिंह का समर्थन किया। बाद में विरोधी माधव सिंह ने पंच सरदारी के राजस्व से उन्हें वंचित कर दिया। इससे गंगा नारायण सिंह और आक्रोशित हो गए। 26 अप्रैल 1832 को उन्होंने अपने सौतेले भाई और दीवान माधव सिंह की हत्या कर दी। इसी के साथ भूमिज विद्रोह की शुरुआत हुई। गंगा नारायण सिंह को अंग्रेजों से भी गहरी नफरत थी। उनके पिता को बंदी बनाकर अपमानित किया गया था। खुद भी अंग्रेज सैनिकों से अपमान सहना पड़ा था। गंगा नारायण सिंह ने भूमिज सरदारों से संबंध मजबूत किया। सरदार वाहिनी सेना बनाई। जंगल महल और मेदिनीपुर इलाके में घूम-घूमकर अंग्रेजों से लोहा लिया। उन्होंने उत्तराधिकार कानून, लगान, गैर-आदिवासी दारोगा प्रथा, जमींदारी-घाटवाली पुलिस व्यवस्था, जमीन नीलामी कानून, नमक कानून और जबरन नील की खेती के खिलाफ आंदोलन चलाया। 1832-33 में उनके नेतृत्व में जनजातीय जनआंदोलन हुआ। इस आंदोलन ने अंग्रेजी शासन को इस क्षेत्र से लगभग खत्म कर दिया। अंग्रेजों ने उन्हें हंगामा करार दिया। उन्हें पकड़ने वाले को 5000 रुपए इनाम और लगान माफ करने का वादा किया। 7 फरवरी 1833 को वह लड़का कोल का नेतृत्व करते हुए खरसावां के ठाकुर चैतन सिंह की मदद के लिए बढ़े, लेकिन ठाकुर चैतन सिंह ने धोखे से हमला कर दिया। वीर गंगा नारायण सिंह की हत्या कर दी गई। उनका सिर काटकर कप्तान विलकिंसन को भेजा गया।

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