जयपुर के पूर्व राजपरिवार के सदस्य सवाई पद्मनाभ सिंह ने पहली बार स्कॉटलैंड में 4 जून 2024 को हुए अपने एक्सीडेंट पर भास्कर से बात की है। डॉक्टर्स ने उन्हें एक साल तक घोड़ों से दूर रहने और पोलो नहीं खेलने की सलाह दी थी। पद्मनाभ ने बताया कि- मैं पूरी तरह हिल गया था। इसके बाद खुद की रिकवरी पर काम करते हुए अपने खेल को बेहतर बनाया। इसका परिणाम यह है कि जयपुर पोलो टीम ने इस सीजन 12 टूर्नामेंट जीते, 8 टूर्नामेंट के सेमीफाइनल खेले और 2 में उपविजेता रहे। पढ़िए- इंटरनेशनल पोलो प्लेयर का पूरा इंटरव्यू… सवाल: जयपुर पोलो टीम ने रिकॉर्ड बनाया है, 12 टूर्नामेंट जीते हैं, बतौर प्लेयर कैसे देखते हैं? पद्मनाभ सिंह: पूरी दुनिया में अगर पोलो की कोई लिगेसी एक्सेप्ट करती है। सबसे बड़ी लिगेसी तो जयपुर पोलो की ही है। सवाई मानसिंह साहब ने इसे 100 साल पहले शुरू किया था। पोलो का जो वर्ल्ड कप खेला जाता है, वह भी जयपुर की ही देन है। उन्होंने कहा कि यह लीगेसी 20-25 साल से साइलेंट हो गई थी। इसलिए हम पिछले दो साल से इसकी लिगेसी को फिर से मुकाम दिलाने का प्रयास कर रहे थे। सबसे ज्यादा किसी टीम ने टूर्नामेंट जीते हैं तो वह जयपुर की पोलो टीम है। इस सीजन में भी जयपुर टीम ने बेहतर प्रदर्शन किया है। सवाल: आपका फाइनल का गोल सबसे ज्यादा चर्चा में है। वह आपके लिए किस तरह मैमोरी बन गया है? पद्मनाभ सिंह: अक्सर मैं इन चीजों को भूल जाता हूं। लेकिन उस गोल की बात करें तो इसका एक अलग प्रभाव रहा है। उसे गोल के कारण हम टूर्नामेंट जीत पाए। यह मेरे लिए बड़ा अचीवमेंट था। वह गेम ऊपर नीचे चल रहा था। 2 मिनट बचे हुए थे। दोनों टीम बराबर पर खेल रही थीं। ऐसे में वह गोल उस समय आया, जब हमें लीड की जरूरत थी। हम उस गोल की बदौलत टूर्नामेंट जीत गए। एक खिलाड़ी के लिए गोल महत्वपूर्ण नहीं होता है, उसके लिए उसकी टीम की जीत महत्वपूर्ण होती है। इसलिए मैं बहुत खुश हूं कि उस गोल की वजह से टूर्नामेंट जीत पाए। सवाल: एक्सीडेंट के बाद आपकी मनोस्थिति क्या थी? किस तरह आपने खुद को मैदान पर तैयार किया? पद्मनाभ सिंह: मेरे और मेरे परिवार के हादसे के बाद का टाइम काफी कठिन था। हम तीन लोगों का एक्सीडेंट हुआ था। मेरी मदर पर भी पॉलिटिकल रिस्पांसिबिलिटी थी। पूरा परिवार इधर-उधर हो रखा था। मैं एक प्रोफेशनल पोलो प्लेयर हूं। इसलिए भी मेरे लिए वह काफी कठिन था। बतौर पोलो प्लेयर मेरे करियर पर सवाल था। डॉक्टर अलग-अलग चीज बोल रहे थे। कोई यह भी कह रहे थे कि कभी नहीं खेल पाओगे। एक डॉक्टर ने कहा था कि आप 1 साल हॉर्स राइडिंग ही नहीं कर पाओगे। मैंने उस समय अपनी फिजियोथैरेपी पर बहुत ध्यान दिया। उस समय मेरा एक ही गोल था कि घोड़े पर वापस बैठना है। आप देखिए गोविंद देव जी का आशीर्वाद है कि इस सीजन हमने सबसे बेहतरीन परफॉर्म किया है। सवाल: राजस्थान टूरिज्म को लेकर भी आप लगातार काम कर रहे हैं। यहां के टूरिज्म को कैसे आगे बढ़ाया जा सकता है? पद्मनाभ सिंह: राजस्थान टूरिज्म के ऑब्जेक्टिव को लेकर जिस तरह मेरी मां दीया कुमारी काम कर रही हैं, वह काफी प्रभावशाली है। लोगों को देखने को मिल रहा है कि पूरे राजस्थान के टूरिज्म की पूरी दुनिया में चर्चा हो रही है। भले ही फ्रांस के प्रेसिडेंट हो या जेडी वेंस का दौरा हो। कोई भी भारत आ रहा है तो वह जयपुर जरूर आना चाह रहा है। अब कोई डाउट का मामला नहीं रहा है कि जयपुर एक टूरिस्ट डेस्टिनेशन है या नहीं है। हमारा परिवार इस दिशा में काम कर रहा है। मैंने जयगढ़ फेस्टिवल किया। मेरी सिस्टर गौरवी कुमारी ने पीडीकेएफ आर्टिजन कलेक्टिव किया। जो टूरिस्ट इंडिया आ चुका है, उसने सारे टूरिस्ट साइट देख लिए है। उसको हम तीसरी बार, चौथी बार कैसे वापस लाएं, उसकी लाइफ में हम कैसे एक्सपीरियंस ऐड करें। जो उसे दुनिया में कहीं नहीं मिल सकता। इसलिए हम वैल्यू टूरिज्म पर काम कर रहे हैं। उसको आगे आने वाले दिनों में हम प्रमोट करने वाले हैं। नरेन्द्र सिंह चला रहे थे गाड़ी, पद्मनाभ की हुई थी सर्जरी सवाई पद्मनाभ सिंह के पिता नरेन्द्र सिंह ने बताया- हादसे की घटना पिछले साल चार जून की है। मैं गाड़ी चला रहा था। हमारा बहुत खतरनाक एक्सीडेंट स्कॉटलैंड में हुआ। उस एक्सीडेंट में पद्मनाभ की स्पाइन में तीन बड़े फैक्चर हो गए। लोगों की दुआओं के बाद ऑपरेशन हुआ। वह सक्सेसफुल रहा। उनके एक प्लेट लगाई गई, चार स्क्रू लगाए गए। पद्मनाभ पोलो के लिए ही बना- नरेंद्र सिंह पद्मनाभ के पिता ने कहा कि- वो पोलो के लिए ही बना है। एक्सीडेंट के छह हफ्ते तक हम ट्रैवल नहीं कर सकते थे, इसलिए तब तक हम लंदन में रहे। इसके बाद ये जयपुर आए और जयपुर एयरपोर्ट से आते ही ये घोड़ों के पास पहुंच गए। ये यहां देख रहे थे कि मैं घोड़े पर बैठ सकता हूं या नहीं। घोड़े पर बैठे, खुद को अच्छा महसूस किया। जब मुझे और इनकी मां को पता लगा कि ये घोड़े के पास गए हैं। हम नाराज भी हो गए थे। इन्होंने अपने ऊपर खूब मेहनत की और अपनी रिकवरी की। सात-आठ हफ्तों बाद तो इन्होंने अपना खेल शुरू कर दिया था।


