अमनदीप सिंह गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी ने पंजाब में पहली बार विदेशी लाल केले के पौधों में फल लगवाने में कामयाबी पाई है। लाल केले की पहली पैदावार के शोध की अगुवाई यूनिवर्सिटी के जैव प्रौद्योगिकी और कृषि विभाग ने की है, जिसे प्रो. पीके पति लीड कर रहे हैं। प्रो. पति और उनकी टीम ने नई तकनीकों की मदद से इस अनोखे केले की खेती को पंजाब की जमीन पर आजमाया और इसमें उन्हें कामयाबी मिली। लाल केला, जिसे मूसा एक्यूमिनाटा भी कहा जाता है, अपनी लाल-बैंगनी छिलके वाली सुंदर बनावट और मलाईदार, मीठे स्वाद के लिए जाना जाता है। ये केले पोषक तत्वों से भरपूर होते हैं और इनमें फाइबर, विटामिन सी, पोटेशियम और एंटीऑक्सिडेंट जैसे बीटा-कैरोटीन व एंथोसायनिन भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। ये तत्व पाचन, इम्यून सिस्टम और दिल की सेहत के लिए फायदेमंद माने जाते हैं। पंजाब में परंपरागत रूप से गेहूं और चावल की ही खेती होती रही है। ऐसे में इस तरह की नई और टिकाऊ फसलों का आना किसानों के लिए फायदेमंद हो सकता है। इससे फसल विविधता बढ़ेगी, मृदा की सेहत सुधरेगी और किसान जलवायु बदलाव के असर को झेलने में ज्यादा सक्षम बनेंगे। प्रो. पति ने बताया कि इस खास केले की खेती शहरी बागवानी और कृषि वानिकी के लिए भी बेहतर है, क्योंकि इसकी बढ़वार घनी होती है और देखने में भी यह सुंदर लगता है। यूनिवर्सिटी के छात्र भी इस प्रोजेक्ट में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। वे पौधों को तैयार करने से लेकर जैव तकनीकों के इस्तेमाल तक हर स्टेप में हाथ बंटा रहे हैं। इससे उन्हें सस्टेनेबल खेती और आधुनिक कृषि तकनीकों का अच्छा अनुभव मिल रहा है। प्रो. पीके पति ने कहा, “लाल केले का फल आना पंजाब की मिट्टी में नई संभावनाओं के दरवाजे खोलने जैसा है। यह सिर्फ एक नया फल नहीं है, बल्कि नवाचार और शिक्षा को खेती से जोड़ने की कोशिश है।” उन्होंने यह भी बताया कि साउथ इंडिया में तो इस केले का खूब इस्तेमाल होता है। इस मौके पर यूनिवर्सिटी के कुलपति प्रो. डॉ. करमजीत सिंह ने कहा कि पंजाब में इस तरह की नई फसलों की खेती से किसानों की आमदनी बढ़ेगी और खेती को नया रास्ता मिलेगा। यह पहल पंजाब की कृषि को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम है।


