बीकानेर आज 538वां स्थापना दिवस मना रहा है। शहर में युवा और बच्चे सुबह सूर्योदय के साथ ही छत्त पर चढ़कर पतंगबाजी कर रहे हैं। महिलाएं आज खीचड़ा बनाएगी और साथ में गर्मी से बचने के लिए कोल्ड ड्रिंक के रूप में इमलाणी तैयार करेगी। आज अक्षय द्वितीया और कल अक्षय तृतीया यानी आखातीज के दो दिनों में ही बीकानेर में करोड़ों रुपए की पतंग और मांझे की बिक्री होने की उम्मीद की जा रही है। उधर, चाइनीज मांझे से घायल होने वालों की सेवा के लिए समाजसेवियों की एक टीम पीबीएम अस्पताल में तैयार है। जोधपुर तत्कालीन महाराजा से नाराज होकर आए बीका ने 538 साल पहले इसी शहर में स्थित बीकाजी की टेकरी पर शहर को बसाने का निर्णय किया था। कभी जांगळ प्रदेश के नाम से पहचाने गए बीकानेर ने आज देश के प्रमुख शहरों में अपना नाम स्थापित कर लिया है। भुजिया, रसगुल्लों से पहचान बनाने वाला बीकानेर असल में अपनी बीकानेरियत को बनाए रखने के लिए पहचाना जाता है। परम्पराओं के निर्वाह में सबसे आगे रहने वाले बीकानेर में आज भी जाति और धर्म का भेद भुलाकर लोग एक जैसा खाना बनाते हैं। घरों में महिलाएं गेहूं और बाजरे का खीचड़ा बना रही है तो गर्मी से बचने के लिए इमली के पानी को विशेष रूप से तैयार करके इमलाणी तैयार करती है। दिनभर गूंजेगा “बोई काट्या” सुबह छह बजे से ही लोग छतों पर चढ़ गए हैं। आज शाम को सूर्यास्त होने तक पतंगबाजी का दौर चलेगा। आखाबीज से ज्यादा उत्साह कल यानी आखातीज को देखने को मिलेगा। वैसे तो पूरे शहर में ही पतंगबाजी हो रही है लेकिन सबसे ज्यादा असर पुराने शहर में देखने को मिल रहा है। सुबह आठ नौ बजे तक लोग छत पर डटे हुए थे। शाम होते ही फिर ऐसा ही नजारा दिखाई देगा। वहीं आखातीज को यानी कल भी जमकर पतंगबाजी होगी। आखातीज को तो लोग छत पर छांव का प्रबंध करके भी पतंगबाजी करते हैं। दिनभर में एक मिनट भी ऐसा नहीं होगा, जब छत पर कोई न कोई पतंग ठुमके लगाती नजर न आए। आज उड़ेगा चंदा हर बार की तरह आज जूनागढ़ से चंदा उड़ा जाएगा। पतंग से थोड़ा अलग गोल चंदा कागज का ही बनता है लेकिन ये थोड़ा मोट कागज होता है। इसके पीछे लकड़ी के बांस लगे होते हैं और मांझे के बजाय इसे रस्सी से उड़ाया जाता है। बीकानेर की संस्कृति को बनाए रखने में कई परिवार चंदे का पूजन करते हैं और इसे उड़ाते हैं। बीकानेर के बृजेश्वर व्यास और उनका परिवार हर साल चंदा बनाकर उड़ाते हैं और उपलब्ध भी कराते हैं। घर-घर मटकी स्थापना आज ही के दिन घर-घर नई मटकी की स्थापना की जाती है। गर्मी में शुद्ध और ठंडे पानी की उम्मीद के साथ मटकी की पूजा भी की जाती है। नई मटकी के साथ ही घर के सदस्यों के जितनी छोटी-छोटी मटकियां भी रखी जाती है। कामना की जाती है कि कभी पानी की कमी नहीं रहेगी।


