छोटे से गांव चकर से उठी सिमरन धंजल की मुक्केबाजी की गूंज अब अंतरराष्ट्रीय रिंग तक पहुंच चुकी है। जॉर्डन में आयोजित अंडर-17 जूनियर एशियन बॉक्सिंग चैंपियनशिप में 60 किलो भार वर्ग में सिल्वर मेडल जीतकर सिमरन ने न सिर्फ गांव का, बल्कि पूरे देश का नाम रौशन किया है। सिमरन ने क्वार्टर फाइनल में जॉर्डन की अलहंत आया को हराया, फिर सेमीफाइनल में सेरहिएन्को डार्ली को पछाड़ा। फाइनल मुकाबले में उज्बेकिस्तान की इसोएवा रुशानाबोनू के सामने डटी रही सिमरन, मगर कड़े मुकाबले में सिल्वर से संतोष करना पड़ा। मगर उसके हौंसले और प्रदर्शन ने हर किसी का दिल जीत लिया। सिमरनजीत चोटें छुपाकर अभ्यास करती रही बेटियां तंग करती थीं, इसलिए मैदान ले जाना शुरू किया। क्या पता था एक दिन देश का नाम रौशन करेगी। मेरी बेटी सिमरनजीत कौर आज देश की उभरती हुई बॉक्सर बन चुकी है। कोविड के समय जब स्कूल बंद थे, बेटियां दिन भर घर में उधम मचाती थीं। थक हारकर मैं उन्हें सुबह-सुबह ग्राउंड ले जाती थी। यहीं से सिमरनजीत के संघर्ष और सफलता की कहानी शुरू हुई। ग्राउंड में दोनों बेटियों को लेकर जाती थी। छोटी बेटी जसप्रीत खेलने में रुचि नहीं ले पाई और घर के कामों में मेरे साथ हाथ बंटाने लगी। वहीं सिमरनजीत का मन पूरी तरह खेल में रम गया। हालात इतने खराब थे कि हमें सिमरन को खेलने से रोकना पड़ा। लेकिन कोच मीत सिंह और खिलाड़ी मनदीप ने घर आकर समझाया कि लड़की में दम है, देश का नाम रोशन करेगी। हमने फिर से भरोसा किया और सिमरन को मैदान भेजना शुरू किया। हमारे लिए सिमरन की डाइट जुटाना भी मुश्किल था। कभी भीगे चने, कभी गर्म दूध और कभी दलिया…यही था उसकी एनर्जी का स्रोत। कोच कभी-कभी अकादमी से डाइट की मदद कर देते। मेरे पति राजमिस्त्री हैं, काम भी कम मिल रहा है और ऊपर से बेटे की बीमारी का इलाज कराते हुए परिवार कर्ज में डूब चुका है। बॉक्सिंग के दौरान सिमरन को कभी चोट लग जाती तो मुझे नहीं बताती थी। अगर बताती कि चोट लगी है, दर्द हो रहा है, तो शायद मैं उसे दोबारा मैदान में जाने नहीं देती। पर उसने दर्द सहकर खुद को साबित किया। -जैसा सिमरन की मां सिंदरपाल कौर ने बताया


