मनुष्य अपने वर्चस्व के लालच में रिश्तों को नहीं पहचानता, यही उसे नाम सुमिरन से दूर करता है

भास्कर न्यूज | जालंधर मनुष्य अपने वर्चस्व के लालच में रिश्तों को नहीं पहचानता है। अहंकार, ईष्या मन में घर कर जाती है। इंसान को इसका त्याग करना चाहिए। ये स्वभाव नकारात्मकता से भर देता है, जिसे इंसान पहचान नहीं पाता है। यह बात श्री नर्मदेश्वर शिव मंदिर बाबा बुड्ढा जी नगर में जारी श्रीमद्भागवत कथा के अंतिम दिन कथाव्यास ने कही। उन्होंने कहा कि विनम्रता रिश्तों का महत्व बताती है। मनुष्य को भगवान के नाम जाप से जोड़ती है। वृंदावन से पधारे कथा व्यास बृजकिशोर जी ने जीवन जीने के सूत्रों से भक्तों को जोड़ा। शुक्रवार को कथा व्यास बृजकिशोर जी ने राजसूय यज्ञ के बारे बताया। उन्होंने कहा कि भगवान कृष्ण ने इस यज्ञ में सभी की नियुक्तियां कर दी, किसी को कोषाध्यक्ष बनाया, किसी को सचिव बनाया, किसी को भंडारी बनाया, प्रधान पद पर स्वयं बैठकर अपने लिए कहा कि यज्ञ के बाद जो संत ब्राह्मण भोजन करके उठेंगे उनकी झूठी पत्तल मैं उठाऊंगा। यही नम्रता है हमारे द्वारकाधीश की। उन्होंने कहा लेकिन आज मनुष्य अपने वर्चस्व के कारण किसी को नहीं पहचानता और न ही अपने से छोटे मानुष को मिलकर व छोटे कार्य को करके राजी है। हमारे द्वारकाधीश भगवान धन्य हैं, जिन्होंने इस कार्य को कर मानवता के लिए संदेश दिया कि कार्य कभी छोटा-बड़ा नहीं होता। सेवा करने से मन को आनंद की प्राप्ति होती है। पंडित शरण ने सुदामा चरित्र सुनाते हुए कहा कि एक गरीब ब्राह्मण, जो बचपन में भगवान का परम सखा था, मित्र के हिस्से के चने खाकर जीवन में गरीबी आ गई। लेकिन वही ब्राह्मण सुदामा जब द्वारकाधीश से मिलने गए तो द्वारकाधीश ने उनको सरआंखों पर बैठाया। इस मौके पर सुरिन्दर सिंह जसवाल, प्रेम लता व अन्य उपस्थित रहे। कथा के समापन दिवस पर मौजूद भक्त और नगर के श्रद्धालु।

FacebookMastodonEmail

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *