छत्तीसगढ़ में धान का मूल्य ज्यादा होने से जैसे दूसरे राज्यों के लोग यहां खपाने पहुंचते थे ठीक वैसे ही अब तेंदूपत्ता भी खपाया जा रहा है। गरियाबंद जिले में तेंदूपत्ता खरीदी में बड़ी धांधली सामने आई है। बिचौलिए ओडिसा से सस्ते दामों में तेंदूपत्ता खरीदकर छत्तीसगढ़ के सरकारी खरीदी केंद्रों में खपा रहे हैं। झाखरपारा और लाटापारा लघु वनोपज समिति के अंतर्गत ओडिसा सीमा से लगे 15 से अधिक फड़ों में यह गड़बड़ी चल रही है। 28 अप्रैल से शुरू हुई तेंदूपत्ता खरीदी में बिचौलिए ओडिसा के सीमावर्ती इलाकों से मोपेड पर पत्ते लाकर स्थानीय कार्डधारी संग्राहकों को दे रहे हैं। बिचौलिए ओडिसा से 200 से 300 रुपए प्रति सैकड़ा की दर से पत्ते खरीद रहे हैं। इन्हीं पत्तों के लिए छत्तीसगढ़ सरकार संग्राहकों को 550 रुपए प्रति सैकड़ा का भुगतान करेगी। हालांकि, इन पत्तों की गुणवत्ता खराब होने के कारण खरीदी करने वाली कंपनियां सरकार को 500 रुपए प्रति सैकड़ा भी नहीं दे रही हैं। पिछले तीन दिनों में अकेले झाखरपारा समिति के अधीन झिरीपानी, बरही, दीवानमूड़ा और केंदू बंद जैसे 10 से अधिक फड़ों में 100 से ज्यादा कार्डधारियों के माध्यम से 400 मानक बोरा तेंदूपत्ता खपाया जा चुका है। डेली रिपोर्ट ऑनलाइन होता है, पर रिपोर्टिंग नहीं तेंदूपत्ता की खरीदी नीति के मुताबिक पत्ते की खरीदी वन विभाग के अधीन आने वाले लघु वनोपज सहकारी समिति करती है, प्रत्येक फड़ के लिए फड़ मुंशी होते हैं, खरीदी की जवाबदारी निभाने वाले समिति प्रबंधक को खरीदी की सूचना रोजाना, निगरानी करने वाले वन विभाग जहां रेंजर पोषक अधिकारी की भूमिका में होते हैं उन्हें देना होता है। लेकिन आज पत्ता खरीदी को 5 दिन हो गए समिति प्रबंधक द्वारा इसकी सूचना अब तक पोषक अधिकारी के दफ्तर में ऑन लाइन नहीं कराया है। मामले में रेंजर मूरचूरिया ने अब तक नहीं हुई एंट्री की पुष्टि की है। साथ ही कहा है कि ओडिसा से अगर पत्ते आ रहे हैं तो इसे रोक लगाया जायेगा और लाने के प्रमाण मिले तो आवश्यक कार्रवाई भी होगी। उत्पादन नहीं इसलिए बढ़ गई ओडिसा पर निर्भरता पिछले एक दशक से लगातार तेंदूपत्ता की उत्पादन में भारी कमी आई है। जानकार की माने तो देवभोग इलाके में तेंदू पत्ता का उत्पादन ज्यादातर लगानी और राजस्व भूमि में मौजूद पौधों पर थी।धान की अच्छी कीमत मिली तो खाली पड़े भूमि को किसान खेतों में तब्दील कर दिया। जानकारी के मुताबिक पिछले एक दशक में 60 से 70 फीसदी उत्पादन घट गया। गुणवत्ता में गिरावट, बोली घट गई 2018 के पहले तक 250 रुपए प्रति सैकड़ा सरकार तेंदूपत्ता के लिए भुगतान करती थी। 2019 के बाद कीमत दुगुना हो गया। कांग्रेस सरकार ने 450 रुपए किया तो भाजपा सत्ता में आते ही 550 रुपए प्रति सैकड़ा देना शुरू कर दिया। अच्छी कीमत मिलते ही ओडिसा से पत्ते लाने लगे। प्रदेश के पत्ते की तुलना में ओडिसा से आने वाले पत्ते की साइज छोटी और गुणवत्ता मानक से कम पाई गई। इसलिए सीमावर्ती इलाके के संस्थाओ में खरीदी जाने वाली पत्तों की बोली में भारी गिरावट आ गया। सरकार ने 550 रूपए प्रति सैकड़ा निर्धारित किया है पर गुणवत्ताहीन होने के कारण पिछले तीन सालों की भांति इस बार भी ठेका कंपनी बोली कम लगाए हैं। इससे सरकार को करोड़ों का नुकसान होगा। इस नुकसान के चलते संग्राहकों को सरकार बोनस भी नहीं देगी। ओडिसा सीमा से लगे समती में लगाई गई बोली देवभोग रेंज के 7 समिति केंद्रों में खरीदी जाने वाले 5800 मानक बोरा पत्ते को इस साल बंशी धर ट्रेडिंग कंपनी खरीदी करने जा रही है। निविदा में तय अनुबंध के मुताबिक कंपनी मूढ़गेलमाल, अमलीपदर समिति के पत्ते के एवज में 472.5 रुपए प्रति सैकड़ा देगी। झाखरपारा, गोहरापदर समिति के पत्ते 462.5 रुपए प्रति सैकड़ा तो देवभोग और लाटापारा समिति के एवज में 452.5 रुपए प्रति सैकड़ा देगी। इसके अलावा तेतलखूंटी समिति के पत्ते की बोली भी 5 हजार से कम आंकी गई है। जिले के 62 में से देवभोग के 7 समिति छोड़ सभी में फायदा बोली में सबसे अच्छा कीमत मदनपुर और महुवाभाटा का है जहां 11 हजार से ज्यादा रुपए प्रति मानक बोरा की बोली लगी है। इसके अलावा गौरगाव, मूढ़ीपानी, रसेला,अड़गड़ी, कसाबाय, नवागढ़, गुजरा, पीपर छेड़ी, छिंदोला, कनसिंघी, कोठी गांव, दल्ला, दादर गांव, मोगरा, बम्हनी, तेंदुबाय, नागंबुडा पारसूली समरती में 10 से 11 हजार के बीच की बोली लगाई गई है।


