रिम्स में दवाओं का टोटा… वेंटिलेटर पर पड़े मरीजों के परिजनों से भी मंगवाई जा रही बेहोशी की दवा

रिम्स के रजिस्टर्ड रिकॉर्ड लिस्ट में शुभम कुमार, राजेश सिंह, अखिलेश्वर मिश्रा, आकाश कुमार, सुजीत मुंडा, सबीना परवीन… ऐसे कई नाम दर्ज हैं। इन्होंने रिम्स की आईसीयू में भर्ती होकर अपना इलाज कराया है। इलाज के बाद आज कुछ लोग जीवित हैं। जबकि, कुछ की जान इलाज के दौरान चली गई। अधिकतर रोगियों की स्थिति गंभीर थी, जान जाने का कारण भी बीमारी ही बनी। लेकिन इलाज के दौरान रिम्स के स्टॉक में अधिकांश जरूरी दवाएं उपलब्ध नहीं होने के कारण परिजनों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ा। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि रिम्स के आईसीयू में जो रोगी वेंटिलेटर सपोर्ट पर हैं, उन्हें लगातार दी जाने वाली बेहोशी की दवा भी पर्याप्त मात्रा में रिम्स में उपलब्ध नहीं है। मरीज को एनेस्थिसिया देकर इंट्यूबेट किया (वेंटिलेटर सपोर्ट में डाला) जाता है। इंट्यूबेशन के दौरान तो रिम्स में उपलब्ध दवा काम आती है। इसके बाद मरीज की स्थिति के अनुसार करीब 4-5 दिन से लेकर 10-10 दिन तक मरीज को बेहोशी में रखना अनिवार्य होता है। ऐसे में उन्हें लगातार बेहोशी की दवा दी जाती है। लेकिन, रिम्स में यह दवा उपलब्ध नहीं होने से परिजनों से बाहर से मंगवाई जाती है। करीब 15 दिन में 100 से ज्यादा मरीजों को बेहोशी की दवा निजी दवा दुकान से खरीदकर लानी पड़ी है। 150 रुपए प्रति वॉइल कीमत, रोजाना 4 से 5 की जरूरत बेहोशी की दवा के प्रति वॉइल की कीमत करीब 150 रुपए है। वेंटिलेटर सपोर्ट में मरीज को रोजाना 4 से 5 वॉइल देनी पड़ती है। इसमें एक मरीज के पीछे प्रतिदिन 750 रुपए तक परिजनों को खर्च करने पड़ रहे हैं। यदि यह दवा औसतन 5 दिन भी चलती है तो 3500 से 4000 तक खर्च करने पड़ रहे हैं। जबकि यह मेडिकल कॉलेज या सरकारी अस्पताल में मरीजों को नि:शुल्क दी जानी है। राजधानी की एक ही दुकान में है दवा, वहां जाने को विवश हैं परिजन रिम्स से 7 किमी दूर से क्वॉलकेट-केटामिन इंजेक्शन ला रहे परिजन बेहोशी की दवा रिम्स के सप्लाई में है, लेकिन कुछ महीनों से सप्लाई करने वाली एजेंसी बेहोशी की दवा पर्याप्त संख्या में उपलब्ध नहीं करा पा रही। वेंटिलेटर सपोर्ट पर इलाजरत सभी मरीजों के लिए बेहोशी की दवा काफी जरूरी है, ताकि वेंटिलेटर सपोर्ट में मरीज शुरुआत के 3-4 दिन पूरी तरह रेस्ट कर सकें। यह दवा मरीज को समय-समय पर देना अस्पताल प्रबंधन की जिम्मेदारी है। लेकिन सप्लाई में कमी होने के कारण मरीजों को अस्पताल की ओर से सीमित डोज ही दी जा रही है। नतीजतन, दवा के अभाव में डॉक्टर द्वारा पर्ची देने के बाद परिजनों को बेहोशी की दवा क्वॉलकेट/ केटामिन इंजेक्शन रिम्स से करीब 7-8 किलोमीटर दूर स्थित निजी दवा दुकान से खरीदनी पड़ रही है। निजी दुकानों में भी यह दवा बिना चिकित्सक की पर्ची के नहीं दी जानी है। ऐसे में रिम्स में भर्ती मरीज के परिजन रिम्स की पर्ची लेकर निजी दवा दुकान जा रहे हैं। इंसुलिन तक बाहर से लेनी पड़ रही… दैनिक भास्कर के पास सैकड़ों पर्चे हैं, जो इस बात के प्रमाण हैं कि रिम्स में भर्ती मरीजों को बाहर से महंगी दवाएं खरीदकर लानी पड़ती है। मरीज मनोरंजन प्रसाद गुप्ता के लिए परिजन ने रिम्स कैंपस स्थित दुकान से मेरोमैक 10 एम इंजेक्शन व 4 एमएल लैसिक्स इंजेक्शन खरीदी, इसके लिए उन्हें 2330 रुपए खर्च करने पड़े। मरीज अखिलेश तिवारी के लिए परिजन ने एनएस 3%, लैसिक्स और मेरोफेनम इंजेक्शन खरीदी।

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