नवा रायपुर में पुरखौती मुक्तांगन के पास आदिवासी संस्कृति पर आधारित छत्तीसगढ़ का पहला म्यूजियम तैयार हो गया है। पिछले 7-8 साल से इसे बनाने का काम जारी था। हालांकि, अब इसके लोकार्पण की तारीख सामने आ गई है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के हाथों 14 मई को इसका उद्घाटन किया जाएगा। आदिवासी अनुसंधान व प्रशिक्षण संस्थान परिसर में बने इस म्यूजियम में सरगुजा से लेकर बस्तर तक के आदिवासियों के रहन-सहन, खान-पान, संस्कृति और परंपराओं को देखा जा सकेगा। इसे आदिम जनजातियों की भौगोलिक बसावट के हिसाब से तीन हिस्से उत्तर, मध्य और दक्षिण में बांटा गया है। यहां 14 गैलरियों में प्रदेश की 42 जनजातियों से संबंधित पूरी जानकारी मिलेगी। मुक्तांगन जाने वाले लोग महज आधे किलोमीटर की दूरी तय कर इसे भी देख सकेंगे। इसमें विभिन्न जनजातियों के जन्म, विवाह और मृत्यु की परंपराएं, आवास के साथ उपयोग होने वाले बर्तन, शिकार करने के हथियार, पहनावे, तरह-तरह आभूषणों की जानकारी शामिल है। इसके अलावा खेती, मनोरंजन के साधन, नृत्य-गीत, धार्मिक परंपराएं, त्योहार, पारंपरिक तकनीक और उनकी सांस्कृतिक विरासतें भी दिखेंगी। ये बातें इस म्यूजियम को प्रदेश के कोने-कोने से जोड़ती है। 3 साल से इकट्ठा कर रहे थे चीजें
म्यूजियम के लिए पिछले तीन साल से चीजें इकट्ठी की जा रहीं थीं। अनुसंधान समिति के सदस्य दल बनाकर हर अंचल में जा रहे थे। उनके रहन-सहन, पहनावे को देखकर उसकी फोटो ली गई। इसी से ही म्यूजियम में रिप्लिका तैयार की गई है। समिति के मुख्य डॉ. अनिल विरुलकर बताते हैं कि अधिकतर आर्टिफैक्ट्स काफी पुराने और पांच-छह पीढ़ी पहले के आदिवासियों द्वारा उपयोग किए गए हैं। इन्हें स्थानीय लोगों को उचित मूल्य देकर खरीदा गया। इसके अलावा कई लोगों ने खुद भी ये चीजें दी हैं। हाइटेक म्यूजियम में आप खुद को आदिवासी वेशभूषा में देख सकेंगे
म्यूजियम पूरी तरह से हाइटेक है। यहां रखी चीजों को 3-डी व्यू में देखा जा सकेगा। इसके लिए यहां पर बड़ी स्क्रीन लगाई गई है। साथ ही हर गैलरी में एक कियोस्क सिस्टम लगा है। इसमें उस गैलरी से जुड़ी सारी जानकारियां दिखेंगी। यहां अनुवाद की सुविधा भी है। यहां ‘डांस विद ट्राइब’ सेक्शन बनाया गया है, जहां लोग खुद को आदिवासी वेशभूषा में लाइव देख सकेंगे। दिखेगी घोटूल संस्कृति का जीवंत झलक
म्यूजियम में मुरिया-माड़िया जनजाति में प्रचलित घोटुल संस्कृति की जीवंत झलक मिलेगी। महापाषाण काल में शवों के अंतिम संस्कार की प्रक्रिया भी दिखेगी। इसके अलावा, भुजिया जनजाति में विवाह परंपरा और लाल बंगला रसोई घर जैसी ही कई अनूठी परंपराओं को यहां देखा जा सकेगा। यहां इन जनजातियों की पहचान
– उत्तरी आदिवासी क्षेत्र : इस क्षेत्र में अंबिकापुर, बलरामपुर, कोरिया, मनेन्द्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर, सूरजपुर. जशपुर, रायगढ़, कोरबा जिले में निवासरत जनजातीय समुदायों और उनकी उप-समूहों को सम्मिलित किया जा सकता है। यहां उरांव, कंवर, नगेसिया, कोरवा, भुईहर, भूमिया, धनवार, सोंता, बियार, मझवार, मांझी, खड़िया, बिरहोर, कोंध , बैगा आदि जनजाति निवास करते हैं। – मध्य आदिवासी क्षेत्र : इस क्षेत्र के अंतर्गत बिलासपुर, जांजगीर-चांपा, महासमुंद, गरियाबंद, दुर्ग, बालोद, राजनांदगांव, कबीरधाम, मुगेली, बलौदाबाजार, रायपुर, बेमेतरा, मानपुर, मोहला चौकी, आदि जिले समाहित हैं। यहां गोंड, हलवा, कमार, भुजिया, कोंध, बैगा, सवरा, कंवर, पारधी, बिंझवार, धनवार, सोंता, भैना, कोल आदि जातियां निवासरत हैं। – दक्षिण आदिवासी क्षेत्र : इस क्षेत्र को सामान्यतः बस्तर क्षेत्र के नाम से जाना जाता है। दक्षिणी आदिवासी क्षेत्र अंतर्गत राज्य के कांकेर, कोंडागांव, नारायणपुर, बस्तर, बीजापुर, दंतेवाड़ा और सुकमा जिला सम्मिलित हैं। हल्बा, गदबा, परजा, दोरला, भतरा, मुरिया, माड़िया, गोंड, धुरवा, अबूझमाड़िया आदि प्रमुखता से निवासरत है। आदिम जाति विकास विभाग के प्रमुख सचिव सोनमणि बोरा ने कहा, आदिम जनजातियों की जीवनशैली पर आधारित म्यूजियम का 14 मई को मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय लोकार्पण करेंगे। यह छत्तीसगढ़ को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर विशिष्ट पहचान दिलाएगा। यहां आदिम जनजातियों की सांस्कृतिक, धार्मिक और सामाजिक परंपराओं को दिखाया गया है।


