रिटायर्ड सैन्य अफसरों का जज्बा बरकरार, बोले- जरूरत पड़ी, तो सीमा पर जाएंगे

भारत और पाकिस्तान के बीच चल रहे संघर्ष को लेकर रिटायर्ड सैन्य अधि​कारियों का जोश हाई है। उन्होंने कहा है कि अगर उन्हें मौका मिला, तो वे फिर से वह सीमा पर युद्ध के लिए जाने को तैयार हैं। उन्होंने कहा कि 1971 की लड़ाई में वह दुश्मनों को नाकों चने चबाने को मजबूर कर चुके हैं। बिना किसी टेक्नोलॉजी के दुश्मनों को धूल चटा चुके हैं। रिटायर्ड अधिकारियों ने कहा कि जरूरी नहीं कि सभी को गोला-बारूद चलाने का ही काम दिया जाए। वे देशसेवा के लिए हर तरह से तैयार हैं। सीमा पर युद्ध करने को तैयार हैं। सेवानिवृत्त कर्नल बोले – 1971 में सीमित संसाधन में जीता था युद्ध रिटायर्ड कर्नल लाल एमएन शाहदेव 1971 में युद्ध का हिस्सा थे। उन्होंने बातचीत के दौरान कहा कि उस समय और आज के हालात में काफी फर्क है। 1971 के दौर में भारतीय सेना के पास सीमित संसाधन और तकनीक थी। पोस्ट पर कब्जा करने के लिए सीधे पैदल सेना को आगे बढ़ना पड़ता था। तोपों के साथ हमले करने होते थे। पैदल सेना के दम पर दुश्मन की पोस्टों को खाली कराया जाता था। रशियन टी-45 टैंक नए-नए आए थे, जो कीचड़ में भी आसानी से चलते थे। हालांकि आज के दौर में स्थित पूरी तरह से बदल गई है। युद्ध के तरीके बदल गए हैं। सेना के पास मिसाइल, ड्रोन औैर अत्याधुनिक फाइटर है। राफेल, मिराज 2000 और तेजस जैसे संसाधन से सेना लैस है। जमीन पर कम और हवा में अब ज्यादा लड़ाई लड़ी जा रही है। पहली बार राफेल और पृथ्वी मिसाइल का भी उपयोग हुआ है। इस बार सेना का मनोबल काफी हाई है। सेना को खुली छूट मिली है। अब भारत वह नहीं रहा जो पहले था। आज का भारत तकनीकी रूप से मजबूत है और दुश्मनों को ठोक कर जवाब देना जानता है। घर में घुस कर मारना जानता है। भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध जैसे हालात उत्पन्न होने के बाद शुक्रवार को दैनिक भास्कर ने सेना के उन रिटायर्ड अधिकारियों से बातचीत की, जो 1971 के युद्व का हिस्सा थे। रिटायर्ड सैन्य अधिकारियों ने कहा कि अगर जरूरत पड़ी, तो फिर से वह सीमा पर जाने को तैयार हैं। अधिकारियों ने यह भी कहा कि युद्ध के दौरान यह कोई जरूरी नहीं कि सभी को गोला-बारूद चलाने का ही काम दिया जाए। युद्व जैसे हालात में अन्य कई तरह के सहयोग की आवश्यकता होती है। एक-एक जवान के अलावा देश के बच्चा-बच्चा का सहयोग महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में अगर उन्हें फिर से देश सेवा का मौका दिया जाता है, तो पूरी निष्ठा के साथ स्वीकार करने को तैयार हैं। 1971 के युद्ध का हिस्सा रहे कंपनी कमांडर कर्नल एसके सिन्हा ने कहा कि जवानों का मनोबल काफी हाई होता है। पूरे तेवर के साथ दुश्मनों का सामना करते हैं। सीमित संसाधन और तकनीक से हमने युद्व जीता है। अब तो हाई टेक्नॉलोजी आ गयी है जिससे हमें काफी मजबूती मिली है। लक्ष्य को पूरा करना ही एक मकसद होता है। जोश इतना ज्यादा बढ़ा हुआ था कि चोकीबल और तंगधार सेक्टर में रहते हुए अपनी टीम के साथ मिलकर भारतीय सीमा को 5 स्क्वायर किलोमीटर तक बढ़ा दिया था। 3 बिहार ही उस डिविजन की एकमात्र यूनिट थी, जिसने इस प्रकार की सफलता प्राप्त की थी।

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