भारतीय दर्शन विश्व का महानतम दर्शन है। विश्व में भौतिक साधन बहुत लोगों के पास हैं, भारत में भी आधुनिक ज्ञान बहुत है, जो केवल पैसा कमाना सिखाता है। यह मानव के कल्याण का मार्ग नहीं है। आधुनिकता की दृष्टि से भारत संपन्न है, परंतु भारत अपने वास्तविक ज्ञान और स्वरूप को भूलता जा रहा है। हमें इस भूल को सुधारना चाहिए। भारतीय जीवन दर्शन में अविद्या और विद्या दोनों महत्वपूर्ण हैं, दोनों का बहुत महत्व है, इसलिए भारत कट्टरपंथी नहीं है। भारत तो अखिल विश्व के कल्याण की बात करता है, लेकिन इस समय तीसरे युद्ध की तैयारियां चल रही हैं। एरोड्रम क्षेत्र में दिलीप नगर नैनोद स्थित शंकराचार्य मठ इंदौर के अधिष्ठाता ब्रह्मचारी डॉ. गिरीशानंदजी महाराज ने अपने नित्य प्रवचन में सोमवार को यह बात कही। भारत सज्जन और साधु है, पर कायर नहीं महाराजश्री ने कहा कि वर्तमान वैश्विक परिस्थिति में सबकी दृ्ष्टि भारत की ओर है, क्योंकि भारत शांति स्थापित करता है, सज्जनता का प्रतीक है, साधु है, पर कायर नहीं है। सज्जनता को मौन भीरुता और पलायनवाद का चोला पहनाकर कायरता की नींद सुला दिया गया है। यह ध्यान रहे जब कोई सदाचारी मानव अन्याय, अनीति के विरुद्ध खड़ा हो जाता है तब अत्याचारी, अनाचारी को अपना दुष्कृत्य छोड़ने के लिए बाध्य होना पड़ता है या वह छोड़कर चला जाता है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- परित्राणाय साधुनां विनाशाय च दुष्कृताम्…अर्थात वह व्यक्ति ही सज्जन है, जो साधुता की रक्षा करता है, उसका सम्मान करता है और उनकी रक्षा की बात करता है। जो इनके साथ अमंगल करता है, वह उन्हें अपनी बुद्धि-विवेक से समूल नष्ट कर देता है। हमने सज्जन और सज्जनता को समझा ही नहीं डॉ. गिरीशानंदजी महाराज ने कहा कि दुर्भाग्यवश हमारे पास गीता जैसे ग्रंथ होते हुए भी हम बरसों गुलामी की जंजीर में जकड़े रहे, क्योंकि हमने सज्जन और सज्जनता को समझा ही नहीं। साधुओं का कोई चिह्न नहीं होता वरन वे अपने कार्यों के द्वारा पहचाने जाते हैं। महान आचार्यों ने राष्ट्र एवं समाज का कल्याण करके अपनी साधुता का परिचय दिया है। जब तक हम अपने ग्रंथों और पुराणों को नहीं समझेंगे, तब तक देश में रामराज्य और अखंड भारत की कल्पना केवल स्वप्न ही रहेगी।


