झारखंड में बाघ बढ़कर 6 हुए, डॉल्फिन व कछुआ घटे, बेतला के वाइल्ड डॉग लुप्तप्राय

भास्कर एक्सपर्ट दो दशक पहले तक जो पशु-पक्षी हमें आसानी से दिख जाते थे, वे अब विलुप्ति की श्रेणी में आ गए हैं। लुप्त प्राणियों के प्रति जागरूकता के लिए मई के तीसरे शुक्रवार को राष्ट्रीय लुप्तप्राय प्रजाति दिवस मनाया जाता है। भारतीय गिद्ध, एशियाई हाथी, गंगा डॉल्फिन, कछुआ, उड़ने वाली गिलहरी, गुलाबी सिर वाली बत्तख, घड़ियाल मगरमच्छ, पैंगोलिन, रसेल वाइपर, बाघ आदि सहित कई प्रजातियों की संख्या में कमी आई है। साहेबगंज में डॉल्फिन व कछुए भी लुप्तप्राय श्रेणी में आ गए हैं। झारखंड में गिद्ध कम हो रहे हैं। रांची के कूटा में गिद्धों के संरक्षण के लिए पार्क बनाने की प्रक्रिया कई सालों से चल रही है। पिछली गणना में झारखंड में एक बाघ पाया गया था, जो अब 6 देखे जाने की बात आ रही है। बेतला नेशनल पार्क में पाए जाने वाले वाइल्ड डॉग भी नहीं के बराबर रह गए हैं। राजकीय पक्षी कोयल की संख्या में कमी आई है। जानवरों का प्राकृतिक आवास सुरक्षित रहेगा, तभी संख्या बढ़ेगी
प्रधान मुख्य वन संरक्षक शशिकर सामंता ने बताया कि हाथी को हम लुप्तप्राय में नहीं मानते हैं, क्योंकि जितने हैं, वही झारखंड के लिए काफी हैं। वैसे वैश्विक स्तर में इसकी संख्या घटी है, लेकिन झारखंड में ठीकठाक है। तेंदुआ की संख्या भी हमारे यहां सही है। लुप्त हो रहे प्रजातियों को बचाने के लिए हैबिटेट (प्राकृतिक निवास स्थान) का संरक्षण जरूरी है। हैबिटेट सुरक्षित रहेगा, तभी संख्या बढ़ेगी। सभी जानवरों का हैबिटेट अलग होता है। बाघ अलग तरह का हैबिटेट पसंद करता है तो तेंदुआ अलग। लोग जंगल मतलब एक ही समझ लेते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। जैसे सुंदरवन के बाघ के लिए मैंग्रोव फॉरेस्ट जरूरी है। 100 स्कॉवर फीट में कितने टाइगर रहेंगे यह निश्चित है, उससे ज्यादा टाइगर हो जाएं तो गड़बड़ हो जाएगा। जितने हिरण रहेंगे, उतने ही टाइगर होने चाहिए। झारखंड में अगर एक जगह हाथी रहेंगे, तो सारा जंगल वे चट कर जाएंगे। हाथी बहुत खाते हैं, इसलिए वे घूमते रहते हैं, ताकि जब वापस उस जगह पहुंचेंगे तो पेड़ में फिर से पत्ते आ जाएं। पिछली गणना में 1 बाघ था, अभी 6 बाघ देखे जाने की खबर
एसआर नरेश, सीसीएफ वाइल्डलाइफ, रांची ने बताया कि ऐसे कई पशु-पक्षी हैं, जिनकी संख्या में कमी आई है। इन्हें एंडेंजर्ड कैटेगरी में रखा जाता है, यानी खतरे के निशान के पास। इनमें हाथी भी आता है, लेपर्ड (तेंदुआ), टाइगर (बाघ), भालू भी है। पिछली गणना के अनुसार अभी हाथी की संख्या झारखंड में 678 हो गई है। टाइगर की संख्या 1 है, लेकिन 6 टाइगर का आवागमन देखा गया है। टाइगर और लेपर्ड को अधिकतर पलामू में देखा जाता है। झारखंड में 6 बाघ फिलहाल घूम रहे हैं। बाघ पीटीआर पलामू से दलमा गए, वहां से नामकुम तरफ देखा गया है। रांची के आसपास अभी घूम रहे हैं। वहीं 55 तेंदुआ झारखंड में हैं। भालू की पूरी तरह गिनती नहीं हो पाई है। छोटे जानवरों की सही काउंटिंग नहीं हो पाती है।

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