मोहम्मद रफी के जन्मशताब्दी वर्ष में अदब की महफिल ने पूरे साल उनके गीतों की चार महफिलें सजाईं। इनमें उनके सौंवे जन्मदिन के मौके पर चौथी और आखिरी महफिल रविवार की शाम लाभ मंडपम में सजी। यहां जयपुर से आए गायक अपूर्व शर्मा और अंबाला के अभिजीत शर्मा ने रफी के गीत पेश किए। दिल्ली की इंदु ठाकुर बेंगलुरु की श्रुति भिड़े ने भी साथ निभाया। महफिल में रोमांटिक गीतों के साथ दर्द भरे, गंभीर और मस्तीभरे गीतों का अच्छा समायोजन था। तुम मुझे यूं भुला न पाओगे… गीतों की महफिल का आगाज अपूर्व और श्रुति ने रफी और लता के युगल आ जा तेरी याद आई… से किया। इसके बाद श्रुति ने तुम मुझे यूं भुला न पाओगे… गाया और अभिजीत ने गाया मेरी आवाज सुनो..। इन शुरुआती गीतों ने ही श्रोताओं पर रफी का रंग चढ़ा दिया। एक गीत खत्म होते होते श्रोता अनुमान लगाने लगते कि अब अगला गीत कौन-सा होगा। एक न एक दिन ये कहानी बनेगी… रफी साहब के सोलो गीतों में अपूर्व ने एक न एक दिन ये कहानी बनेगी… गाया तो अभिजीत ने गाया राधिके तूने बंसी चुराई…। सोलो गीतों में हुई शाम उनका खयाल आ गया, रुख से जरा नकाब हटा दो…, चाहे कोई मुझे जंगली कहे…, फिर मिलोगे इस बात का वादा कर लो… आदि गीतों के साथ महफिल अपने चरम तक की ओर पहुंचती रही। ना ना करते प्यार तुम्हीं से कर बैठे… कार्यक्रम में कई बेहतरीन युगल गीत गाए गए जिनमें दिल एक मंदिर है…, पर्वतों के पेड़ों पर…, ना ना करते प्यार तुम्हीं से कर बैठे…, एक परदेसी मेरा दिल ले गया…., उड़े जब जब जुल्फें तेरी…, गुनगुना रहे हैं भंवरे…, रात के हमसफर…, ओ मेरे सोना रे…, चुरा लिया है तुमने जो दिल को… आदि गीतों ने ऐसा समां बांधा कि श्रोता भी साथ साथ गुनगुना उठे। गीतों को और सुरीला बनाया संगीत संयोजक नीतेश शेट्टी की टीम ने। कार्यक्रम के शुरुआती दौर का संचालन हेमंत गट्टानी ने किया। बाद में संजय पटेल ने संचालन किया।


