छत्तीसगढ़ को ‘धान का कटोरा’ कहा जाता है। किसान धान की बंपर पैदावार लेते हैं, लेकिन रबी (गर्मी की फसल) की धान पर अब सूरज का कहर बरप रहा है। मैदानी इलाकों का पारा लगातार 40 डिग्री सेल्सियस के पार है। सिंचाई के पारंपरिक जल स्रोत तालाब, कुंए पट या सूख चुके हैं। किसान बोरवेल पर निर्भर हैं। इस साल बोरवेल का जल स्तर तेजी से गिरा है, या सूखे पड़े हैं। पानी न मिलने से धान की करीब 50% फसल बर्बाद हो गई है। इससे किसानों को प्रति एकड़ 40-50 हजार रुपए का भारी नुकसान हुआ है। रायपुर, दुर्ग, धमतरी, महासमुंद और बलौदाबाजार के किसानों के खेतों तक पहुंची भास्कर टीम ने पाया कि बीते साल की तुलना में इस साल रबी की फसल का रकबा 1.38 लाख एकड़ (56,000 हेक्टेयर) तक कम हो गया है। कृषि विभाग के अधिकारी कहते हैं-साल-दर-साल रकबा घटने और किसानों के जागरूक होने पर ही भू-जल स्तर नियंत्रण में आ सकता है। उधर, भू-जल स्तर को गिरने से बचाने के लिए धमतरी कलेक्टर नम्रता गांधी ने गर्मी शुरू होने के पहले जल जगार अभियान चलाया। किसानों को समझाइश दी कि वे धान की जगह मक्का, चना की फसल लें। रायपुर समेत कई जिलों में इस तरह के अभियान चले। खरीफ (बारिश की फसल) प्रदेश में 40 लाख हेक्टेयर में धान लगती है। इसे 100 से 110 दिन 24 घंटे डेढ़ से 2 इंच पानी चाहिए होता है। इसकी पूर्ति बारिश के पानी से होती है। बारिश में भू-जल स्तर रिचार्ज होता है। जरूरत पर बोर, तालाब व नहर से सिंचाई के विकल्प होते हैं। रबी (गर्मी की फसल)- रबी का रकबा 1.8 लाख हेक्टेयर है। इस मौसम में सिंचाई 100% बोरवेल, नहर पर निर्भर रहती है। जहां नहर नहीं है, वहां केवल बोर पर निर्भर हैं। उधर, रबी में धान की फसल लेने से मूंगफली, रामतिल, तिल, सोयाबीन, अलसी और सरसों के रकबे में भारी गिरावट हुई है। जल संरक्षण के लिए सरकार का कदम सीएम विष्णुदेव साय ने जल संकट से निपटने 24 अप्रैल को 11,693 गांवों में जल संरक्षण महाअभियान ‘मोर गांव, मोर पानी’ की शुरुआत की। इसका उद्देश्य भू-जल स्तर बढ़ाना, तालाबों का संरक्षण। क्योंकि अच्छी फसल के लिए पानी जरूरी है। भास्कर एक्सपर्ट गौतम बंदोपाध्याय, संयोजक नदी घाटी मोर्चा डीपी कुर्द्धति, भू-वैज्ञानी, रिटायर्ड प्रोफेसर, रविवि छत्तीसगढ़ के संपन्न होने की वजह जंगल, धान, अच्छी बारिश और तालाबों का स्ट्रक्टर रहा है। तालाब पटने से भू-जल स्तर घट रहा है। इनके संरक्षण के लिए नीति बनानी होगी। इसके अलावा तालाब भू-जल रिचार्जिंग के स्रोत हैं। अगर, इन्हें संरक्षित करें तो जल संकट नहीं होगा। अच्छी खेती के लिए गांव में जल संरक्षण व तालाब संरक्षण जरूरी है। इस बारे में जागरुकता फैलाने के साथ लोगों की सहभागिता बढ़ानी ही होगी। किसान दूसरी फसलों के बारे में सोचें किसानों को धान को छोड़ दूसरी फसल लगाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। धान को पानी चाहिए, इस वजह से बोरवेल का इस्तेमाल हो रहा है और भू-जल नीचे जा रहा है। जिला कलेक्टरों ने इस इसे लेकर अभियान चलाए हैं। राजनांदगांव में मक्का, धमतरी में किसानों ने चना लगाना शुरू किया है। -शहला निगार, कृषि उत्पादन एवं सचिव, कृषि विभाग तिलईपाली में 200 एकड़ में धान की फसल लगती थी। अब 25% बची है, बाकी पानी न मिलने से मर चुकी है। मेरी 5 एकड़ फसल में से 75% बर्बाद हो गई। – अनिल पटेल, महासमुंद 32 एकड़ में धान लगाई है। 10 बोर हैं, जिनमें 6 सूख चुके हैं। ले-देकर सिंचाई हो रही है। 5 एकड़ में पानी नहीं पहुंचने से फसल बर्बाद हो चुकी है। – लोकनाथ नायक, बलौदाबाजार


