कवि मीर अली मीर ने भास्कर से साझा की यादें…:अपनी मौत की अफवाह पर बोले थे सुरेंद्र टेंशन में मत रहना, टाइगर अभी जिंदा है…

पद्मश्री डॉ. सुरेंद्र दुबे नहीं रहे जन्म- 8 जनवरी 1953
मृत्यु- 26 जून 2025 जाने-माने हास्य कवि व पद्मश्री डॉ. सुरेंद्र दुबे का गुरुवार को निधन हो गया। जानकारी के अनुसार रायपुर के एडवांस कार्डियक इंस्टीट्यूट में उनका इलाज चल रहा था, जहां उन्हें हार्ट अटैक आया। एसीआई के कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. स्मित श्रीवास्तव ने भास्कर को बताया कि सुरेंद्र दुबे जी की 25 जून को एंजियोग्राफी की थी। 1 नस में 100% और दूसरी 95% ब्लॉकेज था। तत्काल उनकी एंजियोप्लास्टी की, जो सफल रही। 26 जून की सुबह वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया था। वे बातचीत कर रहे थे, लेकिन दोपहर को कार्डियक अरेस्ट आया। इसके बाद भी उन्होंने रिकवर कर लिया था। लेकिन 2-3 अरेस्ट आए और वे शांत हो गए। डॉ. सुरेंद्र दुबे से मेरा परिचय काफी पुराना है, लेकिन 22 जून को उन्होंने मुझे पहली बार फोन किया। मैंने फोन उठाया और सामने से आवाज आई, मैं सुरेंद्र दुबे बोल रहा हूं। तबीयत थोड़ी खराब है, इसलिए जब कार्यक्रम शुरू होने वाला रहे तो मुझे फोन करना। मैंने उन्हें फोन कर बुलाया। कवि सम्मेलन से पहले मंच के पीछे हॉल में हम बैठे थे। यहां उन्होंने मुझसे कहा- मेरा अभिनंदन ग्रंथ छप रहा है, जिसमें देशभर के कवियों ने मेरे लिए जो कहा है, उसका उल्लेख है। जल्द ही इसका विमोचन होना है और तुम्हे आना है। मैंने हामी भरी, फिर मंच से हमने कविता पाठ किया। यहां भी उन्होंने वो कविता सुनाई, जिसका जिक्र वे हमेशा करते हैं। राजस्थान के कवि की मौत पर जब लोगों ने समझ लिया था कि छत्तीसगढ़ के डॉ. सुरेंद्र दुबे हैं। उन्होंने बड़े ही मजेदार अंदाज में कहा-
टेंशन में मत रहना बाबू टाइगर अभी जिंदा है…
मेरे दरवाजे पर कुछ लोग आए
यह कहते हुए कि दुबे जी निपट गे भैया बहुत हंसात रिहीस
मैं निकला बोला- अरे चुप
यह हास्य का कोकड़ा है, ठहाके का परिंदा है,
टेंशन में मत रहना बाबू टाइगर अभी जिंदा है… इसके बाद ठकाके गूंजते रहे। मुझे याद है हमारी पहली मुलाकात साल 2010 में छत्तीसगढ़ विधानसभा में हुई ​थी। तब मंच का संचालन डॉ. सुरेंद्र दुबे कर रहे ​थे। यहां मैंने नंदा जाही का रे… कविता पढ़ी। कविता सुनाने के बाद मैं वापस अपनी जगह पर लौटा तो तब के सीएम डॉ. रमन सिंह ने दोबारा ये कविता पढ़ने की मांग की। इस समय डॉ. दुबे ने कहा- संचालन तो मैं कर रहा हूं, बुलाऊंगा भी मैं ही। तब उन्होंने मुझे दोबारा मंच पर यह कहते हुए बुलाया था कि ये सुरेंद्र दुबे 30 साल से कविता पढ़ रहा है, लेकिन मीर अली मीर ने ऐसी प्रस्तुति दी कि सीएम उनसे दोबारा कविता सुनना चाहते हैं। ऐसे कवि को मैं फिर से मंच पर बुलाना चाहता हूं। इसके बाद चाहे राज्योत्सव हो, कवर्धा हो, भोरमदेव महोत्सव हो, कुरुद का मंच हो हमने साथ में कई अवसरों पर मंच साझा किया। हम जब भी किसी कार्यक्रम में साथ होते तो वापसी के दौरान डॉ. दुबे मुझे साथ लेकर आते। मैं उनकी गाड़ी में सामने की सीट में बैठता और वो पीछे। 2019 का कवि सम्मेलन मैं कभी नहीं भूल सकता। इस कवि सम्मेलन में कुमार विश्वास के साथ हम मंच पर थे। संचालन कुमार विश्वास को कर रहे थे, लेकिन जब कविता पाठ के लिए मुझे बुलाने की बारी आई तो डॉ. दुबे ने माइक थाम लिया। इतनी आत्मीयता और अपनापन का मैं हमेशा ऋणी रहूंगा। डॉ. दुबे छत्तीसगढ़ी की आत्मा के प्रति जीते थे। प्रखर वक्ता, हास्य व्यंग्य के जरिए हंसाने के साथ ही लोगों को बड़ा संदेश देने वाले कवि थे। उनके जाने के बाद जो खालीपन है, उसे कोई नहीं भर पाएगा।

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