भास्कर न्यूज| दंतेवाड़ा भगवान जगन्नाथ की नौ दिनों के बाद अपनी मौसी के घर से वापसी हो गई, भगवान अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ अपनी मौसी देवी गुंडिचा के मंदिर में नौ दिनों का दिव्य विश्राम करने के बाद अपने मूल निवास, श्री मंदिर लौट गए। इस वापसी यात्रा को बाहुड़ा यात्रा कहा जाता है, जो हर साल होने वाली रथ यात्रा का ही एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। दंतेवाड़ा में शाम 5 बजे बस स्टैंड गुंडिचा मंदिर से गाजे-बाजे के साथ महाप्रभु रवाना हुए। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा अपने रथों पर गुंडिचा मंदिर से वापस अपने मुख्य मंदिर की ओर प्रस्थान करते हैं। यह यात्रा भी रथ यात्रा की तरह ही भव्य और उत्साहपूर्ण होती है। इसके बाद तड़प लगी, रोजा होम, अबकाश और सूर्य देव की पूजा जैसे कई महत्वपूर्ण अनुष्ठान संपन्न हुए। द्वारपाल पूजा, गोपाल बलभ और सकाला धूप जैसे दैनिक अनुष्ठान भी किए गए, सेनापतलगी अनुष्ठान के जरिए भगवानों को उनकी वापसी यात्रा के लिए तैयार किया गया, रथों तक भगवानों को लाने की रस्म और छेरा पहरा निभाई गई। यात्रा के दौरान विशेष पड़ाव और अनुष्ठान परंपरा के अनुसार भगवान रथ खींचे जाने के दौरान रास्ते में अपनी मौसी मां के मंदिर (अर्धासनी मंदिर) में थोड़ी देर रुकते हैं। यहां उन्हें पोड़ा पीठा नाम की एक विशेष मिठाई चढ़ाई जाती है। यह मिठाई चावल, गुड़, नारियल और दाल से तैयार की जाती है और इसे भगवान को अर्पित करना एक महत्वपूर्ण अनुष्ठान माना जाता है।


