उर्दू अकादमी बस नाम की…:22 साल में वेबसाइट तक नहीं बन सकी, उर्दू को आगे बढ़ाने कोई कार्यक्रम ही नहीं

छत्तीसगढ़ मदरसा बोर्ड और राज्य उर्दू अकादमी को बंद करने के लिए सरकार मंथन कर रही है। 2003 में बनी उर्दू अकादमी के पास खुद का भवन नहीं है। इस कारण अभी आरडीए के भवन में तहसील के पास 22 हजार रुपए महीने के किराए पर संचालित है। अकादमी के अध्यक्षों, अफसरों ने आज तक अकादमी की वेबसाइट तक नहीं बनाई। अकादमी को बजट के तौर पर करीब 80 लाख रुपए सालाना मिलते हैं, जो सैलरी में चले जाते हैं। उर्दू को आगे बढ़ाने के लिए साल में कोई कार्यक्रम नहीं हो पा रहा है। लाइब्रेरी में दशकों पहले किताबें खरीदी गईं, जो आलमारी में बंद हैं। यही हाल मदरसा बोर्ड का है। 2005 में राज्य में मदरसों की संख्या 400 से ज्यादा थी। धीरे-धीरे घटकर 300 रह गई। 2021-22 में केंद्र ने मदरसों का अनुदान बंद कर दिया। फिर राज्य सरकार से भी मदद नहीं ​दी जा रही। यही वजह है कि अब मदरसे 150 के करीब बचे हैं। अभी मदरसा बोर्ड पीएचक्यू के 3 कमरों में चल रहा है। उसकी हालत स्टोर रूम जैसी है। फाइलों के बीच तीन-चार कर्मचारी बैठे रहते हैं। बोर्ड के पास केवल परीक्षा लेने का काम बचा है, जो 5वीं, 8वीं, 10वीं और 12वीं की परीक्षा ले रहा है। इसमें 200 बच्चे भी शामिल नहीं होते, क्योंकि इस बोर्ड की मार्कशीट को सिर्फ छत्तीसगढ़ में ही मान्यता है। बोर्ड को हर साल 1 करोड़ का बजट, अकादमी को 80 लाख, पूरी रकम वेतन में खर्च बोर्ड व अकादमी अध्यक्ष सालों से कोर्ट के स्टे पर छत्तीसगढ़ मदरसा बोर्ड और उर्दू अकादमी के अध्यक्ष अभी हाई कोर्ट के स्टे पर हैं। मदरसा बोर्ड में पिछले सात साल से सदस्यों की नियुक्ति नहीं हुई है। कांग्रेस शासन काल में राजनांदगांव के अलताफ अहमद को अध्यक्ष बनाया गया था। भाजपा सरकार ने उन्हें हटाना चाहा, तो वे हाई कोर्ट से स्टे लेकर आ गए। इसी तरह अकादमी के अध्यक्ष इदरीश गांधी भी हाई कोर्ट से स्टे लेकर अध्यक्ष पद पर जमे हुए हैं। उनका और 13 सदस्यों का कार्यकाल इसी साल अक्टूबर में खत्म हो जाएगा। बताया जा रहा है​ कि पिछले छह महीने से उन्हें कोई सैलरी या भत्ता नहीं मिला है,क्योंकि शासन ने अकादमी का फंड ही रिलीज नहीं किया है। आरोप है कि इदरीश कांग्रेस से जुड़े हैं। अफसरों की साल में बैठक नहीं मदरसा बोर्ड और उर्दू अकादमी के अफसरों की बैठक साल में एक बार भी नहीं हो रही। मंत्रालय के बड़े अफसर भी समीक्षा के लिए अफसरों को नहीं बुलाते। ऐसा भी हुआ है कि एक ही अफसर को बोर्ड व अकादमी दोनों का प्रभार दे दिया गया। अभी बोर्ड में चंद्र प्रकाश द्विवेदी और अकादमी में असलम खान सचिव हैं। दोनों ही प्रतिनियुक्ति पर हैं। उनका तर्क है कि इतना बजट ही नहीं मिलता कि अतिरिक्त काम हो सके। जिम्मेदारों के अपने-अपने तर्क ​काम: मदरसों को हाइटेक करना था। धर्म के साथ अन्य विषय पढ़ाने थे। छात्रों का कौशल निखारना था।
ये किया: अनुदान पर निर्भर रहे। केंद्र ने फंड देना बंद किया तो मदरसे भी बंद हो गए। प्रचार-प्रसार बंद, छात्रों की संख्या भी हुई कम।
हमें तो बजट ही नहीं मिल रहा है। हर साल पांच से छह करोड़ का बजट मांगा जाता है। आधे से भी कम मिलता है। अभी तो कई साल से वो भी नहीं मिला। कैसे काम होगा।
– अलताफ अहमद, अध्यक्ष छत्तीसगढ़ मदरसा बोर्ड काम: उर्दू को बढ़ावा देने अभियान-कार्यक्रम करने थे। लाइब्रेरी अपडेट करनी थी। प्रोत्साहित करना था।
ये किया: कार्यक्रम-अभियान कभी कुछ नहीं चलाया। लाइब्रेरी के लिए किताबों की खरीदी नहीं की। वेबसाइट तक नहीं बना पाए।
उर्दू को बढ़ावा देने समय-समय पर कार्यक्रम आयोजित कराए गए हैं। लोग उर्दू के प्रति आकर्षित हो इसके लिए हर संभव प्रयास किए। फंड की कमी भी बड़ा मुद्दा है।”
– इदरीश गांधी, अध्यक्ष छत्तीसगढ़ राज्य उर्दू अकादमी ​​​​​​​

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