छत्तीसगढ़ में ओबीसी की गिनती के लिए पिछली सरकार ने क्वांटिफायबल डाटा आयोग का गठन किया था। आयोग ने सभी जिलों की जांच-पड़ताल के बाद एक बड़ी रिपोर्ट तैयार कर तत्कालीन सरकार को सौंप दिया था। लेकिन इसकी रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई है। लेकिन यह रिपोर्ट भास्कर के हाथ लगी है जिसमें इस बात का खुलासा हुआ है कि प्रदेश में अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी वर्ग के 1.25 करोड़ लोग यहां रह रहे हैं। यह प्रदेश की अनुमानित जनसंख्या का 42.41 प्रतिशत है। इसमें 95,17,136 व्यक्ति ग्रामीण और 29,90,033 लोग शहरी क्षेत्रों में रहते हैं। इसी तरह राज्य में आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति 10,26,731 मिले हैं। ये प्रदेश की कुल आबादी का 3.48 प्रतिशत हैं। इसमें से 40.72 प्रतिशत यानी 4,18,437 व्यक्ति गांवों और 6,08,294 व्यक्ति (59.24%) शहरी क्षेत्रों में रहते हैं। आयोग के मुताबिक राज्य की जनसंख्या 2.94 करोड़ है। आयोग की रिपोर्ट में जिक्र है कि 2011 में प्रदेश की आबादी 2,55,44,198 थी। 2021 में जनगणना नहीं हुई। आर्थिक एवं सांख्यिकी संचालनालय के आर्थिक सर्वेक्षण में राज्य की अनुमानित जनसंख्या 2,94,92,999 मानी गई है। इसे आधार बनाकर शासन के राजपत्र में अनुसूचित ओबीसी की 95 उप जातियों को सर्वे में शामिल किया गया। ओबीसी एवं आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के आंकड़े संभागवार, जिलेवार, ब्लॉकवार और पंचायतवार एकत्र किए गए हैं। नगरीय क्षेत्र में निकाय और वार्डवार डेटा जुटाए गए। इसके अनुसार प्रदेश में 1,25,07,169 ओबीसी हैं। आर्थिक, सामाजिक व शैक्षणिक रूप से पिछड़े: रिपोर्ट में उल्लेख है कि ओबीसी का मैदानी इलाकों में घनत्व अधिक है। दूसरी ओर अनुसूचित क्षेत्रों में अपेक्षाकृत संख्या कम है। इस प्रकार नगरीय क्षेत्रों की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में ओबीसी ज्यादा हैं। इनके आंकड़ों का अध्ययन करने से यह पता लगता है कि प्रदेश के ओबीसी वर्ग के लोग आर्थिक, सामाजिक व शैक्षणिक रूप से पिछड़े हैं। इसकी वजह है कि देश के अन्य राज्यों की तुलना में यहां के ओबीसी की जातियां परंपरागत रूप से अलाभकारी कारोबार में लगी हैं। आयोग ओबीसी पर रिसर्च: भाजपा सरकार ने भी ओबीसी की गिनती के लिए छत्तीसगढ़ पिछड़ा वर्ग कल्याण आयोग का गठन किया है। उसने भी ओबीसी गिनती कर राज्य सरकार को रिपोर्ट सौंप दी है। इसी के आधार पर नगरीय निकाय और पंचायत चुनाव में आरक्षण तय कर चुनाव कराए गए हैं। आयोग ने ओबीसी की गिनती करने के बाद उन पर रिसर्च करने का ब्लूप्रिंट बनाया है। राजनीति में प्रभावी तबका: ओबीसी वर्ग प्रदेश की राजनीति में सरकार तय करने वाला निर्णायक वर्ग है। पहले इसे 14 प्रतिशत आरक्षण मिल रहा था। बाद में भूपेश सरकार ने इसे 27 प्रतिशत कर दिया था। लेकिन यह मसला कोर्ट में जाने के बाद इस वर्ग की गिनती के आदेश दिए गए थे। हर राज्य में इसी तरह आंकड़े जुटाने कहा गया है। इसी आधार पर कई राज्य गिनती करा रहे हैं। इन सबका होगा रिसर्च: ओबीसी को लेकर बनाई केंद्र की नीति ही लागू कर दें तो काफी है: साहू अन्य पिछड़ा वर्ग मामलों के विशेषज्ञ प्रोफेसर घनाराम साहू ने कहा कि केंद्र व राज्य की डबल इंजन की सरकारें हैं। प्रदेश में केंद्र सरकार की ओबीसी को लेकर बनाई 2021-22 की नीति ही लागू कर दें काफी है। अगर कुछ कमियां रह जाती हैं तो इसे पूरा कर लिया जाए। इससे ओबीसी का कल्याण हो जाएगा। एसटी-एससी-ओबीसी की केंद्रीय नीति में शर्तें व पात्रता तय हैं। हालांकि इसमें एससी-एसटी-ओबीसी के लिए छात्रवृत्ति की दरें अलग हैं।


