वेदव्यास त्रिवेणी से जल लेकर 75 किमी पैदल चलेंगे कांवरिए, सरना मंदिर में होगा जलाभिषेक

भास्कर न्यूज | सिमडेगा सिमडेगा के सरना महादेव मंदिर में इस सावन माह के तीसरे सोमवार को कांवरिया सेवा संघ सिमडेगा के द्वारा आयोजित कार्यक्रम में श्रद्धालु त्रिवेणी संगम से लेकर जल चढ़ाएंगे। शनिवार को जल उठाकर सोमवार को हजारों की संख्या में भगवान भोलेनाथ को सरना महादेव मंदिर में जलाभिषेक करेंगे। सरना मंदिर सिमडेगा जिला मुख्यालय से करीब दो किलोमीटर दूर एक गांव में है। यहां का शिवलिंग लगभग 72 वर्षों से विख्यात है। यह भी कहा जाता है कि यह शिवलिंग स्वयंभू है। सबसे बड़ी बात यह कि यहां सनातन संस्कृति से जुड़े लोग संयुक्त रूप में महादेव को आराध्य मानते हुए पूजा-अर्चना करने के लिए पहुंचते हैं। सावन में जहां विशाल कांवर यात्रा का आयोजन होता है, तो इससे पूर्व आषाढ़ मास में आदिवासी समुदाय के लोग भी बड़ी श्रद्धा एवं आस्था के साथ महादेव को जल चढ़ाने के लिए पहुंचते हैं। वे भगवान शिव से अच्छी बारिश एवं खेती के लिए प्रार्थना करते हैं। इस तरह देखें तो आषाढ़ व सावन दोनों महीने में भक्त शिव जी का जलाभिषेक करते हैं। ओडिशा के त्रिवेणी संगम से जल भरते हैं कांवरियां कांवरयात्रा में भी हिंदू परिवार के साथ-साथ आदिवासी समुदाय के लोग बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं। सावन की प्रत्येक सोमवारी के मौके पर सिमडेगा जिले से हजारों की संख्या में कांवरिए ओडिशा के वेदव्यास स्थिति त्रिवेणी संगम से जल लेकर पैदल चलते हुए सरना महादेव के शरण में पहुंचते हैं। इस भव्य आयोजन में झारखंड एवं ओडिशा दोनों राज्यों के समाज सेवियों द्वारा कांवर यात्रा को सफल बनाने में योगदान दिया जाता है। कांवरियों की सेवा के लिए तत्पर रहते स्वयंसेवक : कांवरियों की सेवा करने वाले कांवरिया सेवा संघ के पवन जैन मोहित कहते हैं कि वेदव्यास में शंख, कोयल एवं ब्राह्मणी नदी का संगम है। कांवरिया जल लेकर सिमडेगा के लिए वहां से चलते हैं। रास्ते में कांवरियों की सेवा के लिए ओडिशा एवं सिमडेगा के लोग तत्पर रहते हैं। कांवरियों के जलपान, विश्राम, दवा, भोजन, पानी आदि का प्रबंध किया जाता है। इस समय यहां का नजारा देखते ही बनता है। आस्था का केंद्र हैं सरना महादेव : कृष्णा पाठक : सरना महादेव मंदिर के पुजारी कृष्णा पाठक कहते हैं कि यह धाम इस इलाके में काफी प्रसिद्ध हो चुका है। यह आस्था का बड़ा केंद्र बन चुका है। यहां सालों भी लोग पूजा-अर्चना के लिए आते रहते हैं। विशेषकर यहां सावन मास में विशेष पूजा होती है। यह इकलौता मंदिर है जहां आदिवासी और हिन्दू एक साथ पूजा करते हैं। लगभग 75 वर्ष पहले मंदिर का यहां हुआ निर्माण शिवलिंग तो यहां स्वयंभू है, लेकिन यहां सरना महादेव धाम मंदिर का निर्माण 1951 में हुआ। राधा कृष्ण कुल्लुकेरिया ने मंदिर का निर्माण कराया था। तब मंदिर का संचालन कल्लू राम कुल्लुकेरिया किया करते थे। वर्तमान में इस मंदिर का संचालन कुल्लुकेरिया परिवार द्वारा किया जाता है। परिवार के सदस्य दिनेश कुल्लुकेरिया कहते हैं कि यह धाम सरना-सनातन संस्कृति का केंद्र है। यहां जन्माष्टमी धूमधाम से मनाया जाता है। पूजा-कीर्तन में आदिवासी लोग भी बढ़-चढ़कर भाग लेते हैं।

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