डीसी गए दिल्ली, जिले में अफसरों की कुर्सी खाली, नहीं हो रहे लोगों के काम

बोकारो के डीसी अजय नाथ झा नहीं हैं। वे दिल्ली गए हैं। इधर, जिले के अधिकतर अधिकारी गायब हैं। अधिकारियों के नहीं रहने से दूर दराज से आने वाले लोगों का काम नहीं हो रहा है। लोग डीसी ऑफिस आ रहे हैं और अधिकारी नहीं मिलने पर निराश होकर लौट रहे हैं। कई लोगों ने नाम नहीं छापने के आग्रह पर बताया कि जिला के अधिकारियों को अक्सर यही हाल रहता है। अगर जनता नाराजगी जाहिर करेगी, तो उनका काम लटका दिया जाएगा। इसलिए डर से कुछ नहीं बोलते। लेकिन लोगों ने कहा कि इस तरह की लापरवाही पर जनप्रतिनिधियों को ध्यान देना चाहिए।
ताकि अधिकारी समय पर ऑफिस आएं। दैनिक भास्कर ने जब अधिकारियों से संपर्क किया तो किसी ने कहा छुट्टी पर हैं, तो किसी ने कहा सरकारी काम से रांची आए हैं, वहीं कुछ ने कहा फिल्ड विजिट में हैं। इनमें डीटीओ वंदना शेजवलकर, निदेशक सामाजिक सुरक्षा श्रीपीयूस, डीएसई अतुल कुमार चौबे, डीईओ जगरनाथ लोहरा आदि शामिल हैं। जबकि कई अधिकारियों के कार्यालय का दरवाजा बंद मिला। इनमें जिला पंचायती राज पदाधिकारी मो. शफीक और प्रधानमंत्री आवास योजना मैनेजमेंट यूनिट के ऑफिस का गेट बंद था। टांड़ बालीडीह के विकलांग का 16 माह से पेंशन बंद टांड़ बालीडीह के दोनों आंखों से विकलांग निशांत कुमार का मार्च 2024 से पेंशन बंद है। वह लगातार ब्लॉक से लेकर जिला कार्यालय तक चक्कर लगा रहा है, लेकिन पेंशन चालू नहीं हो रहा है। निशांत का बैंक खाता और आधार कार्ड में गड़बड़ी रहने के कारण पेंशन बंद किया गया था। जरीडीह बीडीओ ने 5 अप्रैल 2025 को सामाजिक सुरक्षा विभाग के सहायक निदेशक को प्रतिवेदन भेजा। इसमें बताया गया है कि पेंशनधारी की गड़बड़ी सुधार ली गई है। इसका पेंशन चालू करने का आग्रह किया गया है, लेकिन अभी तक पेंशन चालू नहीं किया गया। मुरलीधर का घर धंस रहा, नहीं मिला आवास कसमार गांव के मुरलीधर साव का मिट्टी का मकान जर्जर हो गया है। चारों तरफ पानी चू रहा है। पूरा घर जलमग्न न हो जाए, इसलिए पानी टपक रहे जगहों पर बर्तन रखकर बचाव करता है। घर की हालत ऐसी है कि कभी भी धंस सकता है। जानमाल की क्षति हो सकती है। लेकिन उन्हें अबुआ आवास या पीएम आवास नहीं मिल रहा है। मुरलीधर का कहना है कि हर बार सर्वे होता है, लेकिन उनका नाम हमेशा नीचे ही रहता है। जब भी आवास मिलने की बारी आती है, उनका नाम नीचे चला जाता है और उनकी जगह दूसरे को मिल जाती है। प्रखंड से लेकर जिला कार्यालय तक आवेदन दिया, लेकिन कोई सुनवाई नहीं होती है। मजदूरी कर गुजारा करें या अफसरों के पास चक्कर लगाएं? प|ी गीता देवी और एक बेटी लक्ष्मी कुमारी के साथ कच्चा व खपरेल मकान में रहने को मजबूर हैं।

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