छत्तीसगढ़ में बिना मान्यता संचालित प्राइवेट स्कूलों पर हाईकोर्ट ने शासन का जवाब सुनकर एक बार फिर नाराजगी जाहिर की है। चीफ जस्टिस रमेश कुमार सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने शिक्षा विभाग के संयुक्त सचिव के जवाब को अपर्याप्त माना है। साथ ही स्कूल शिक्षा विभाग के सचिव को व्यक्तिगत शपथपत्र दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। वहीं, पूछा है कि अब तक इन स्कूलों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई और आगे सरकार क्या कदम उठाने जा रही है। मामले की अगली सुनवाई 17 सितंबर को होगी। जानिए पूरा मामला दरअसल, छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य में पिछले डेढ़ दशक (करीब 15 साल) से बिना मान्यता संचालित हो रहे नर्सरी और प्ले स्कूलों पर कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने कहा कि 5 जनवरी 2013 को पंजीयन के लिए जारी सर्कुलर के बावजूद 15 साल तक नियमों की अनदेखी हुई और बच्चों के भविष्य से खिलवाड़ होता रहा। इस मामले की सुनवाई के दौरान शिक्षा विभाग के संयुक्त सचिव ने शपथपत्र में बताया कि 2013 का सर्कुलर नर्सरी स्कूलों के पंजीयन के लिए है। लेकिन, यह आरटीई एक्ट, 2009 में अनिवार्य प्रावधान नहीं है। विभाग अब नई शिक्षा नीति 2020, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग और राष्ट्रीय प्रारंभिक बाल्यावस्था देखभाल एवं शिक्षा नीति 2013 के अनुरूप रेगुलेटरी गाइडलाइंस फॉर प्राइवेट प्ले स्कूल बनाने जा रहा है। शपथपत्र में कहा गया कि प्ले स्कूल/नर्सरी में कोई औपचारिक परीक्षा नहीं होती और राज्य के 52 हजार आंगनबाड़ी केंद्र नर्सरी स्तर की शिक्षा दे रहे हैं। हाईकोर्ट ने सख्त कदम उठाने दिए निर्देश हाईकोर्ट ने संयुक्त सचिव के इस जवाब को अपर्याप्त मानते हुए टिप्पणी करते हुए कहा कि, 15 साल तक बिना मान्यता स्कूल चलने दिए। अब बच्चों के अधिकारों की रक्षा के लिए तत्काल कदम उठाए जाएं। कोर्ट ने साफ किया कि सचिव खुद शपथपत्र देकर यह बताएं कि बिना मान्यता वाले स्कूलों पर क्या कार्रवाई होगी और नई नीति कब तक लागू होगी। बता दें कि 5 जनवरी 2013 को जारी सर्कुलर के तहत नर्सरी स्कूलों का पंजीयन अनिवार्य किया गया था। इसके बावजूद प्रदेश के कई जिलों में बड़ी संख्या में प्राइवेट नर्सरी और प्ले स्कूल बिना किसी मान्यता के चल रहे हैं। जिसे लेकर कांग्रेस नेता विकास तिवारी ने जनहित याचिका लगाई है।


