भास्कर न्यूज | अमृतसर हालिया हुए नगर निगम और नगर पंचायत चुनावों में उम्मीदवारों द्वारा किए गए खर्चे पर भाजपा की पूर्व सेहतमंत्री प्रो. लक्ष्मीकांता चावला ने सवाल उठाया है। उनका आरोप है कि सब कुछ जान कर भी पर्यवेक्षक और रिटर्निंग अधिकारी अपनी आंखें बंद रखते हैं। उनका कहना है कि पंजाब चुनाव आयोग द्वारा पार्षदों के चुनाव के लिए खर्च की सीमा चार लाख रुपए तय की है और नगर पंचायतों में एक लाख चालीस हजार। जो प्रत्याशी विजयी या पराजित खर्च का विवरण रिटर्न भर कर दे चुके हैं या दे रहे हैं। क्या चुनाव आयोग के अधिकारी उनसे सहमत है? उन पर स्वीकृति के हस्ताक्षर कर चुके है। अगर कर चुके हैं तो इसका सीधा अर्थ है कि चुनाव आयोग के अधिकारी खर्च के पर्यवेक्षक और बाकी के रिटर्निंग अधिकारी यह देख कर भी अपनी आंखें बंद रखते हैं। कितनी शराब बांटी गई? मतदाताओं को कितने नोट दिए गए? नोट और शराब तो पुरानी बात हो गई। वर्षों से बंट रही है। अब और कौन-कौन से गिफ्ट वोट खरीदने के लिए दिए गए? क्या सरकार जानती है? क्या चुनाव आयोग को इसकी खबर है? चुनाव आयोग ही यह शपथ लेकर बता दे कि उसने जो रिटर्न प्रत्याशियों की स्वीकार की है, वह सही है। क्या सरकार व आयोग आंखें बंद किए रहते है? जब चुनावों में करोड़ों रुपए खर्च किए जाते हैं। कुछ प्रत्याशी सरेआम कहते है कि उन्होंने बढ़िया ब्रांड की शराब पिलाई। करोड़ों खर्च किए। अच्छा हो अगर चुनाव आयोग अलग-अलग खर्च राशि तय कर दे। शराब पिलाने की अलग, वोट खरीदने की अलग और अन्य गिफ्ट देने की अलग। अन्यथा चाहे हमारा राष्ट्रीय चुनाव आयोग हो या प्रांतीय चुनाव आयोग। यह केवल रस्म पूरी करता है। चुनाव में क्या-क्या खर्च किया जाता है? कोई नहीं देखता। न ही इनकम टैक्स वाले लेखाजोखा लेते हैं। क्योंकि सब धंधा दो नंबर का होता है। इतना रुपया कहां से आया? यह देखना क्या सरकारों का काम नहीं? इस पर सरकार को पूरा ध्यान देना चाहिए।


