नेशनल स्पोर्ट्स डे पर जब पूरा देश खिलाड़ियों को सलाम कर रहा है, तब छत्तीसगढ़ के खेलो इंडिया एक्सीलेंस सेंटर और खेल अकादमियों की हालत पर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। प्रदेश में कुल 33 स्वीकृत खेल केंद्र हैं, जिनमें से 31 संचालित हो रहे हैं और 2 अभी भी शुरू नहीं हुए (खैरागढ़-छुईखदान-गंडई और मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी)। हॉकी, तीरंदाजी, मलखंभ, फुटबॉल, वॉलीबॉल, कुश्ती, वेटलिफ्टिंग, बैडमिंटन, कबड्डी और खो-खो जैसी विधाओं में खिलाड़ी प्रशिक्षण ले रहे हैं, लेकिन सुविधाओं की कमी उनकी राह में सबसे बड़ी रुकावट बनी हुई है। करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद कई खेलों में अभी तक बुनियादी ढांचा अधूरा है। सवाल यह है कि जब आधारभूत सुविधाएं ही पूरी नहीं, तो खिलाड़ी ‘एक्सीलेंस’ तक कैसे पहुंचेंगे? अधूरी सुविधाएं, अधूरे सपने करोड़ों का खर्च, लेकिन नतीजे अधूरे बड़ा सवाल जब अधूरी सुविधाओं के बावजूद छत्तीसगढ़ के खिलाड़ी देश-विदेश में मेडल ला रहे हैं, तो अगर इन्हें वर्ल्ड-क्लास ट्रेनिंग और इन्फ्रास्ट्रक्चर मिले तो ये कितनी ऊंचाइयों तक जा सकते हैं? क्या एक्सीलेंस सेंटर वास्तव में “एक्सीलेंस” दे रहा है, या फिर यह सिर्फ कागजों तक सीमित है? भास्कर एक्सपर्ट – सुशील मिश्रा, एथलेटिक्स कोच खेलों की चयन प्रक्रिया को और मजबूत बनाने की जरूरत है। ट्रायल ब्लॉक लेवल से होना चाहिए, ताकि ज्यादा से ज्यादा खिलाड़ियों को अवसर मिले। ट्रायल से पहले टैलेंट सर्च प्रोग्राम आयोजित करना जरूरी है, जिससे बच्चों की सही छनाई हो सके। साथ ही खिलाड़ियों को तैयारी का पर्याप्त समय मिलना चाहिए। अगर मार्च में ट्रायल होना है तो जनवरी में ही सूचना मिल जाए, तो खिलाड़ी पूरे आत्मविश्वास के साथ तैयारी कर सकेंगे। ^तीरंदाजी के हेड कोच की भर्ती प्रक्रिया चल रही है। संभवत: अगले महीने तक हम कोच की भर्ती कर लेंगे। -तनुजा सलाम, खेल संचालक


