झारखंड हाईकोर्ट ने रांची सहित राज्य के जलाशयों के अतिक्रमण और उसमें कचरा फेंकने के मामले में सख्त रुख अपनाया है। चीफ जस्टिस तरलोक सिंह चौहान और जस्टिस एसएन प्रसाद की अदालत ने शुक्रवार को जलाशयों के संरक्षण को लेकर विस्तृत निर्देश जारी किया है। अदालत ने अपने आदेश में कहा है कि जलाशयों का अतिक्रमण और उसमें कचरा गिरने देना लोगों के जीवन के मौलिक अधिकार (अनुच्छेद-21) का उल्लंघन है। अदालत ने कहा कि अतिक्रमण का मामला वर्ष 2011 से लंबित है। इस दौरान कई बार आदेश पारित हुए हैं, लेकिन स्थिति अभी भी वैसी ही है। इसका मतलब है कि अदालत के आदेशों का प्रभावी ढंग से पालन नहीं किया गया। इस वजह से जलाशय लगातार सिकुड़ते और खत्म होते गए। जलाशयों को कचरा डंप यार्ड बनाकर बर्बाद होने के लिए छोड़ दिया गया है। यह बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। अदालत ने माना कि सरकार और निगम- प्रशासन की कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। इसलिए अदालत ने जल स्रोतों को अतिक्रमण मुक्त करने और गंदगी हटाने के लिए एक निगरानी कमेटी बनाई है। हटाया गया है अतिक्रमण, अभी कुछ लोगों का कब्जा : सरकार सुनवाई के दौरान रांची डीसी ने हलफनामा दाखिल करके बताया कि कांके डैम क्षेत्र में 20 अतिक्रमण पाए गए थे, जिन्हें 14 अगस्त को हटा दिया गया था। 20 अगस्त को एक और अतिक्रमण मिला, लेकिन उस पर हाईकोर्ट का स्टे लगा हुआ है। गेतलसूद डैम में कोई अतिक्रमण नहीं मिला, लेकिन 20 अगस्त को एक रिपोर्ट मिली, जिसमें पता चला कि ओरमांझी में डैम के क्षेत्र में अतिक्रमण है। हाईकोर्ट ने बड़ा तालाब और कांके डैम में प्लास्टिक व अन्य कचरे फेंकने पर चिंता जताई। अदालत ने कहा कि बड़ा तालाब कांके डैम और गेतलसूद डैम के कैचमेंट क्षेत्र में भी प्लास्टिक व मलबे की डंपिंग हो रही है, जिससे पेयजल स्रोत प्रदूषित हो रहे हैं। अदालत ने स्पष्ट कहा कि ये हालात खतरनाक हैं। इसलिए हर हाल में कचरा फेंकने पर रोक लगाएं।


