पितृपक्ष 7 से… तिथि ज्ञात नहीं तो सर्वपितृ अमावस्या को करें तर्पण

सिटी रिपोर्टर | रांची भाद्रपद पूर्णिमा सात सितंबर से पितृपक्ष शुरू हो जाएगा। 15 दिनों का पितृपक्ष का समापन आश्विन कृष्ण पक्ष अमावस्या 21 सितंबर को सर्वपितृ श्राद्ध के साथ होगा। हिंदू धर्म शास्त्रों में​ पितृपक्ष का विशेष महत्व है। पितृपक्ष में स्नान, ध्यान कर पितरों को तर्पण करने से पूर्वज प्रसन्न होते हैं। पितृ गण हमारे पूर्वज हैं जिनका ऋण हमारे ऊपर है, क्योंकि उन्होंने कोई न कोई उपकार हमारे जीवन के लिए किया है। हमारे सनातन धर्म ने जीवित व्यक्ति को सम्मान करना तो सिखाया ही है वहीं मृत व्यक्ति के प्रति भी सम्मान की भावना रखता है। इसी कड़ी का नाम है श्राद्ध। पितृपक्ष में पितरों का श्राद्ध और तर्पण करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है। हमारे पूर्वज हमें आशीर्वाद देते हैं। उनकी कृपा से जीवन की सारी समस्याएं खत्म हो जाती हैं। पितृपक्ष में श्राद्ध कर्म के साथ-साथ ब्राह्मणों को भोजन कराना और गरीबों को दान देना शुभ फलदायी है। आचार्य प्रणव मिश्रा और ज्योतिष शालिनी वैद्य के अनुसार किसी भी यज्ञ अथवा शुभ कार्य के सफल आयोजन के लिए विघ्नविनाशक गणेश, माता गौरी सहित अन्य देवी-देवताओं की पूजा-अर्चना की जाती है। पूजा-अर्चना में देवी-देवताओं के साथ कुल देवी, कुल देवता, स्थान देवता, पूर्वज तथा दसों दिशाओं की भी पूजा की जाती है। इसलिए पितृ पक्ष में प्रत्येक व्यक्ति को मृत पिता, माता तथा अपने अन्य पूर्वजों के नाम से जल अर्पण अवश्य करना चाहिए। जिस तिथि को पिता की मृत्यु हुई है, उस तिथि को विधि-विधान के अनुसार तर्पण कर दान, पुण्य कर श्राद्ध कर्म करें। अगर तिथि ज्ञात नहीं है तो सर्वपितृ अमावस्या को तर्पण करें। इससे पूर्वजों की आत्मा को शांति मिलती है और पूर्वज प्रसन्न होते हैं। घर में सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है।
पितृपक्ष में अपने पितरों का स्मरण ध्यान और पूजन करना चाहिए। दान के साथ साथ जल का दान करना चाहिए।
जब तक आपका तिथि नहीं आता हो तब तक प्रतिदिन जल दें और ब्रह्मचर्य के नियमों का पालन करना चाहिए।
योग्य और विद्वान ब्राह्मण को बुलाकर विधिवत तर्पण करें तो पानी में काला तिल, फूल, दूध, कुश मिलाकर उससे उनका तर्पण करें। कुश का उपयोग करने से पितर जल्द ही तृप्त हो जाते हैं।
पितृपक्ष में आप प्रत्येक दिन स्नान के समय जल से ही पितरों को तर्पण करें। इससे उनकी आत्माएं तृप्त होती हैं और वे आशीर्वाद देती हैं। {हो सके तो प्रतिदिन या पितरों के लिए भोजन रखें वह भोजन गाय, कौआ, कुत्ता आदि को खिला दें।
पितरों के लिए श्राद्ध कर्म दोपहर तक संपन्न कर लेना चाहिए।
अपने दादा कुल, नानाकुल और ससुराल कुल को जल देना चाहिए। {पितृपक्ष के समय में लहसुन, प्याज, मांस, मदिरा आदि का सेवन नहीं करना चाहिए।
इस समय में अपने घर के बुजुर्गों और पितरों का अपमान न करें। यह पितृ दोष का कारण बन सकता है।
पितृपक्ष में स्नान के समय तेल, उबटन आदि का प्रयोग करना वर्जित है। {इस समय में आप कोई भी धार्मिक या मांगलिक कार्य जैसे सगाई, गृह प्रवेश, विवाह आदि न करें।
कुछ लोग पितृपक्ष में नए वस्त्रों को खरीदना और पहनना भी अशुभ मानते हैं। पर यह शास्त्रमत नहीं है। {मान्यता है कि पितरों का वास घर के सुनसान और एकांत स्थान पर होता है। वैसे स्थान को साफ और हवादार रखें।

FacebookMastodonEmail

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *