हर गली, हर दिल में रोशन हुई मोहब्बत, बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक नात-ए-पाक पढ़ते हुए जुलूस में शामिल

भास्कर न्यूज| लुधियाना लुधियाना के दाना मंडी परिसर में जश्ने ईद-ए-मिलाद-उन-नबी का आयोजन इस बार ऐतिहासिक बन गया। यह साल इसलिए खास रहा क्योंकि यह इस पवित्र पर्व की 1500वीं साला वर्षगांठ थी। करीब 15 से 20 हजार अकीदतमंदों ने इसमें शिरकत की। जुलूस, विशाल सभा और सामूहिक दुआओं के साथ पूरे आयोजन ने अमन, मोहब्बत और भाईचारे का पैग़ाम दिया। दूर-दराज से आए लोग बसों और कारों से सुबह से ही पहुंचने लगे। पूरे परिसर को हरे झंडों, रोशनी की झालरों और फूलों से सजाया गया। जुलूस में बच्चे, युवा और बुजुर्ग समान उत्साह से शामिल हुए। श्रद्धालु हाथों में झंडे लेकर नात-ए-पाक और सलाम के तराने पढ़ते आगे बढ़ते रहे। जगह-जगह स्वागत द्वार सजाए गए। सबीलों पर पानी, शरबत और मिठाई बांटी गई। जुलूस के बाद हुई सभा की शुरुआत कुरआन-ए-पाक की तिलावत से हुई। नात-ख्वानों ने मोहम्मद साहब की शान में नातें पेश कीं। उलेमा-ए-किराम ने कहा कि इस 1500वीं साला जश्न का मकसद सिर्फ जुलूस या सजावट नहीं बल्कि पैगंबर की शिक्षाओं को जीवन में उतारना है। उन्होंने अमन, इंसाफ, मोहब्बत और इंसानियत को अपनाने का संदेश दिया। सभा के अंत में मुल्क की सलामती, गरीबों की मदद, बीमारों की सेहत और समाज में भाईचारे के लिए सामूहिक दुआ की गई। 1500वीं ईद-मिलाद-उन-नबी कार्यक्रम में मौजूद श्रद्धालु। युवा स्वयंसेवकों ने व्यवस्था संभाली। कई स्थानीय संस्थाओं ने पानी, स्वास्थ्य और सफाई में मदद दी। सभा के अंत में लंगर बांटा गया। हजारों लोगों ने अनुशासनपूर्वक भोजन ग्रहण किया। सामूहिक फातेहा पढ़ी गई और देश की तरक्की व अमन-चैन की दुआ मांगी गई। ईद-मिलाद-उन-नबी मुसलमानों के लिए पैग़ंबर मोहम्मद साहब के जन्मदिन की याद है। इस वर्ष का आयोजन 1500वीं साला वर्षगांठ होने के कारण और भी खास रहा। उलेमा ने कहा कि नबी की शिक्षाएं ही आज के दौर में नफरत और हिंसा का हल है। इस आयोजन ने एक बार फिर साबित कर दिया कि इस्लाम की असली पहचान अमन, मोहब्बत और इंसानियत है। आयोजन समिति ने श्रद्धालुओं, प्रशासन, पुलिस, मीडिया और स्वयंसेवकों का आभार जताया और कहा कि भविष्य में ऐसे आयोजनों को शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक सेवा से जोड़ा जाएगा। दाना मंडी का यह आयोजन न सिर्फ धार्मिक पर्व बल्कि अमन और भाईचारे का ऐतिहासिक संदेश बनकर सामने आया। 1500वीं साला जुलूस-ए-मिलाद ने यह स्पष्ट किया कि इंसानियत और मोहब्बत ही इस्लाम की असली तालीम है।

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