मशीनों के दौर में भी यहां कायम है पारंपरिक लोहार कला

प्रकाश मिश्रा | गिरिडीह गिरिडीह जिले के जमुआ प्रखंड स्थित जमखोखरो गांव अपने आप में एक मिसाल है। यहां करीब 65 लोहार परिवार आज भी पीढ़ियों से चली आ रही अपनी परंपरा को जिंदा रखे हुए हैं। दशकों से ये परिवार खेती-बाड़ी में काम आने वाले औजार जैसे कुदाल, खुरपी, हसुआ, गमला, कड़ाही और धान उबालने का कड़ाह (कड़ाही का बड़ा स्वरूप ) हाथ से बनाते आ रहे हैं। एक कड़ाह का वजन 15 -20 िकलो तक होता है। इन औजारों व सामानों की मांग सिर्फ गिरिडीह तक सीमित नहीं है, बल्कि हजारीबाग, चतरा, कोडरमा, रामगढ़, धनबाद, बोकारो, देवघर सहित बिहार के जमुई, भागलपुर, बांका, बिहार शरीफ, नवादा और गया तक फैली हुई है। खासकर धान उबालने वाला बड़ा कड़ाह यहां का सबसे लोकप्रिय उत्पाद है, जिसकी मांग धान कटाई के मौसम में कई गुना बढ़ जाती है। गांव के लोहार धनेश्वर लोहार, कृष्ण कुमार, चंदन कुमार, काशी विश्वकर्मा, अजय विश्वकर्मा, ओमप्रकाश विश्वकर्मा और धर्मेंद्र विश्वकर्मा बताते हैं कि भले ही मशीनों से औजार बनने लगे हों, लेकिन हाथ से बने हमारे औजारों की मजबूती और टिकाऊपन किसानों की पहली पसंद है। यही वजह है कि आज भी लोग हमें खोजते हुए ऑर्डर देने आते हैं। िफलहाल त्योहारों के िलए चूल्हा बनाने में व्यस्त हैं परिवार वर्तमान में, गांव के सभी परिवार त्योहारों के अवसर पर इस्तेमाल होने वाले लोहे के चूल्हे बनाने में जुटे हैं। हर परिवार दिनभर में 50-60 चूल्हे तैयार करता है, जिन्हें आसपास के जिलों के दुकानदार खरीद कर ले जाते हैं। इसके बाद वे खेती-बाड़ी के औजारों के निर्माण की ओर लौटेंगे। चूल्हा – 300 रुपए हसुवा – 50 रुपए। खुरपी – 60 रुपए। कुल्हाड़ी – 150 रुपए फरसुल (बैठी)- 120 कड़ाह – 1200 से 1500 तावा – 150 रुपए हल – 350 रुपए छोटा कड़ाही – 150 रुपए

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