झारखंड के सरकारी विद्यालयों में सोमवार से विशेष अभिभावक-शिक्षक बैठक (पीटीएम) का आयोजन शुरू हो गया है। यह बैठक पिछले वर्ष से हर महीने होती आ रही है, लेकिन इस बार इसकी खासियत यह है कि इसमें स्थानीय सांसद और विधायक भी शामिल होंगे। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने राज्य के सभी मंत्रियों, सांसदों और विधायकों को पत्र लिखकर इस बैठक में अनिवार्य रूप से भाग लेने की अपील की है। यह पहला मौका होगा जब किसी सरकारी स्कूल की पीटीएम में जनप्रतिनिधि मौजूद रहेंगे। मुख्यमंत्री के निर्देश पर भेजा गया निमंत्रण मुख्यमंत्री की पहल के बाद जिला शिक्षा पदाधिकारियों ने स्थानीय सांसदों और विधायकों को निमंत्रण पत्र भेजना शुरू कर दिया है। कोडरमा के जिला शिक्षा पदाधिकारी अविनाश राम ने बताया कि उन्हें भी मुख्यमंत्री कार्यालय से चिट्ठी मिली है। उनके अनुसार, पीटीएम में जनप्रतिनिधियों को जोड़ने का उद्देश्य अभिभावकों की सक्रिय भागीदारी बढ़ाना है। अब तक जहां पीटीएम में शिक्षक, छात्र और कुछ अभिभावक ही शामिल होते थे, वहीं अब सांसद और विधायक भी मौजूद रहेंगे। अधिकारियों का मानना है कि जनप्रतिनिधियों की अपील से अभिभावकों की उपस्थिति में बढ़ोतरी होगी और बच्चों का ड्रॉपआउट रेट घटेगा। साथ ही, स्कूल से जुड़ी समस्याओं का समाधान मौके पर ही संभव होगा। पूर्व शिक्षा मंत्री ने किया स्वागत, पर नाराजगी भी जताई राज्य की पूर्व शिक्षा मंत्री और विधायक डॉ. नीरा यादव ने सरकार की इस पहल का स्वागत किया है। हालांकि उन्होंने कहा कि सरकार को यह कदम पहले ही उठाना चाहिए था। नीरा यादव का कहना है कि जब वे शिक्षा मंत्री थीं, तब इस व्यवस्था की शुरुआत की गई थी, लेकिन सरकार बदलने के बाद इसे समाप्त कर दिया गया। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे को उन्होंने विधानसभा में कई बार उठाया था, परंतु सरकार ने ध्यान नहीं दिया। उन्होंने सरकार पर तंज कसते हुए कहा कि बच्चे वोट बैंक का हिस्सा नहीं होते हैं, फिर सरकार छह साल तक क्यों सोई रही। बावजूद इसके, उन्होंने आश्वासन दिया कि अपने क्षेत्र के बच्चों के हित में वे भी पीटीएम में शामिल होंगी। प्राचार्यों ने भी पहल को सराहा सरकारी विद्यालयों के प्राचार्य भी सरकार की इस पहल को सकारात्मक मान रहे हैं। राजकीय उत्क्रमित प्लस टू उच्च विद्यालय कोडरमा के प्रभारी प्राचार्य उदय कुमार ने कहा कि जब सांसद और विधायक जैसे जनप्रतिनिधि स्कूल पहुंचेंगे, तो पीटीएम में अभिभावकों की उपस्थिति स्वतः बढ़ जाएगी। अब तक जहां केवल 20 से 25 प्रतिशत ही अभिभावक आते थे, वहीं अब 50 प्रतिशत या उससे अधिक की भागीदारी का अनुमान है। उनका कहना है कि जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी से अभिभावकों की झिझक दूर होगी और वे खुलकर अपनी समस्याएं रख पाएंगे। इससे सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता में निश्चित ही सुधार होगा।


