आईआईटी जोधपुर की रिसर्च टीम ने ऐसे नए एमिलॉयड इन्हिबिटर (हानिकारक प्रोटीन रोकने वाली दवा) खोजे हैं, जो एक साथ दो बड़ी समस्याओं, बैक्टीरियल संक्रमण और मस्तिष्क रोग का समाधान कर सकते हैं। आईआईटी के बायोसाइंस और बायो इंजीनियरिंग विभाग की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. नेहा जैन के नेतृत्व में फंक्शनल एमिलॉयड बायोलॉजी लैब की यह रिसर्च भविष्य में ऐसे इलाज का रास्ता खोल सकती है, जो एक साथ संक्रमण और मस्तिष्क रोगों से बचाव करेंगे। इससे दुनियाभर में करोड़ों लोगों की जिंदगी बेहतर हो सकती है। रिसर्च से पता चला है कि बैक्टीरिया अपनी सुरक्षा के लिए एमिलॉयड संरचनाएं बनाते हैं। इससे उन पर दवाओं का असर नहीं होता। इसी तरह, मानव मस्तिष्क में एमिलॉयड के जमा होने से अल्जाइमर और पार्किंसन जैसी गंभीर बीमारियां होती हैं। टीम ने ऐसे इन्हिबिटर डवलप किए हैं, जो दोनों तरह के हानिकारक प्रोटीन जमाव को रोक सकते हैं। बायो फिल्म तोड़ने की नई तकनीक डॉ. जैन के अनुसार बैक्टीरिया अपने चारों ओर चिपचिपी परतें बनाकर खुद को सुरक्षित रखते हैं, जिन्हें बायो फिल्म कहा जाता है। ये परतें एंटीबायोटिक्स को काम करने से रोकती है। इससे एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (दवा प्रतिरोध) की समस्या बढ़ती है। रिसर्च टीम ने नई प्रोटीन संरचनाओं और नैनो टेक्नोलॉजी का उपयोग करके इन बायो फिल्म को तोड़ने के तरीके विकसित किए हैं। टीम किफायती सेंसर और प्रकाश-सक्रिय तकनीकों पर भी काम कर रही है, जो अस्पतालों में संक्रमण की समस्या को कम करने में मदद करेंगी। ये तकनीके विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए उपयोगी होगी। पेट से शुरू होती हैं न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियां रिसर्च में एक अहम खोज यह है कि हमारे पेट (आंत) में मौजूद बैक्टीरिया मस्तिष्क की बीमारियों को प्रभावित कर सकते हैं। दुनिया भर के वैज्ञानिक अब मान रहे हैं कि न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियां पेट से शुरू होती हैं। जब पेट में अच्छे बैक्टीरिया की जगह बुरे बैक्टीरिया ले लेते हैं तो वे अपने बायो फिल्म बनाकर मस्तिष्क में सूजन और बीमारी को बढ़ावा देते हैं। इस गट-ब्रेन कनेक्शन को समझने से भविष्य में अल्जाइमर और पार्किंसन जैसी बीमारियों की जल्दी पहचान और इलाज संभव हो सकेगा। डॉ. नेहा जैन का कहना है- हमारा शोध केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं है। हमें विज्ञान को समाज की सेवा में लगाना है। हमारा उद्देश्य है कि उपचार किफायती, सुलभ और प्रभावी हो। ये खोजें भविष्य में ऐसे इलाज का रास्ता खोल सकती हैं जो एक साथ संक्रमण और मस्तिष्क रोगों से बचाव करेंगे। इससे दुनिया भर में करोड़ों लोगों की जिंदगी बेहतर हो सकती है। सीएसआईआर और आईसीएमआर का सहयोग इस शोध को वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR) और भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR) का वित्तीय सहयोग मिला है। रिसर्च के रिजल्ट्स अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिकाओं में समीक्षा के लिए भेजे जा चुके हैं। इसके अलावा, इंटरनेशनल ब्रेन रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन द्वारा समर्थित एक अन्य परियोजना में टीम ने यह पता लगाया है कि बैक्टीरिया की एमिलॉयड संरचनाएं मानव शरीर की प्रतिरोधक प्रणाली को कैसे प्रभावित करती हैं। यह रिसर्च टेंपल यूनिवर्सिटी, फिलाडेल्फिया, अमेरिका के प्रोफेसर कागला तुकेल की लैब के सहयोग से किया गया है। ग्लोबल अवार्ड, ग्रामीण क्षेत्रों में भी पहुंच रही टीम डॉ. नेहा जैन के अनुसंधान कार्य को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिली है। उन्हें 2024 में ईएमबीओ ग्लोबल इन्वेस्टीगेटर अवॉर्ड और आईएनएसए यंग एसोसिएट अवॉर्ड से सम्मानित किया गया है। डॉ. जैन की टीम केवल लैब में काम नहीं करती, बल्कि समाज तक विज्ञान पहुंचाने के लिए भी सक्रिय है। उन्होंने राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्रों में कई विज्ञान जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए हैं। इन कार्यक्रमों के माध्यम से लोगों को स्वच्छता और बेहतर जीवनशैली के बारे में शिक्षित किया जा रहा है। इस सामुदायिक कार्य को जर्नल ऑफ माइक्रोबायोलॉजी एंड बायोलॉजी एजुकेशन में प्रकाशित किया गया है।


