छत्तीसगढ़ के रायगढ़ जिला में हाथी साल भर विचरण करते हैं। इसमें धरमजयगढ़ वन मंडल का छाल रेंज सबसे अधिक हाथी प्रभावित है। ऐसे में अब किसानों को फसलों का नुकसान कम हो, इसके लिए उन्हें हल्दी की जैविक खेती को लेकर प्रशिक्षण दिया जा रहा है। दो दिवसीय इस प्रशिक्षण का आज दूसरा दिन है। मंगलवार को बिलासपुर के प्रकृति सेवा संस्थान से प्रशिक्षक इसका प्रशिक्षण देने पहुंचे थे। जहां पहले दिन बोजिया ओर कांसाबहाल के 80 किसानों को एक जगह पर एकत्रित किया गया। जिन्हें प्रशिक्षण में बताया गया कि हल्दी की जैविक खेती करने से फसलों को हाथी से बचाया जा सकता है। धान फसल के बजाए हल्दी की जैविक खेती करे। इसमें किसी भी प्रकार रासायनिक दवाओं का उपयोग न किया जाए। जैविक हल्दी की खेती कैसे किया जाए, कब किया जाए इस बारे में पूरी जानकारी दी गई। इसके बाद जैविक हल्दी कीट भी ग्रामीणों को दिया गया। वहीं दूसरे दिन यानि बुधवारको हाटी में प्रशिक्षण कार्यक्रम रखा गया था। जिसमें तकरीबन 50 किसानों को हल्दी की जैविक खेती के बारे में बताया गया। इससे हाथी खेतों में नहीं आते
बताया जा रहा है कि पके हुए धान की सुगंध में हाथी खेतों तक पहुंचते हैं और अगर उसके बदले हल्दी की जैविक खेती की जाए, तो हाथी खेतों में नहीं आएंगे। हल्दी के फसल को हाथी न खाते हैं और न ही नुकसान पहुंचाते हैं। इससे मुनाफा तो होगा, नुकसान भी ग्रामीणों को कम होगा। धरमजयगढ़ वन मंडल में 153 हाथी
धरमजयगढ़ वन मंडल के अलग-अलग रेंज में 153 हाथियों की मौजूदगी है। जिसमें सबसे अधिक हाथी छाल रेंज के बोजिया में 48, पुरूंगा में 13 हैं। इसके अलावा बाकारूमा रेंज के तेजपुर में 28, लैलूंगा रेंज के पाकरगांव में 34, बोरो रेंज के इंचपारा में 13 के साथ-साथ अलग अलग रेंज में हाथियों की मौजूदगी है। इसमें 40 नर, मादा 68 और शावक 45 की संख्या में है।
प्रभावित क्षेत्र में दिया गया प्रशिक्षण
छाल रेंज राजेश चौहान ने बताया कि जैविक हल्दी खेती करने से किसानों को कम नुकसान होगा। हाथी इसे खाते नहीं और इसके लिए छाल रेंज के हाथी प्रभावित 3 गांव के 130 ग्रामीणों को प्रशिक्षण दिया गया। बिलासपुर से प्रशिक्षक आए थे। जिन्होंने हल्दी की जैविक खेती को लेकर कई तरह की जानकारियां दी है।


