‘मां’ शब्द के आकार में तैयार हो रहा नमो उपवन:जबलपुर में नर्मदा किनारे रोपे 6 हजार 990 पौधे, परिक्रमावासियों के लिए होगा आश्रय स्थल

जबलपुर के बरगी में नर्मदा किनारे महाकौशल का पहला मियावाकी पद्धति से जंगल तैयार हो रहा है। इसका नाम ‘नमो उपवन’ रखा है। करीब 26 हजार वर्गफीट में फैले जंगल को ‘मां’ शब्द का आकार दिया जा रहा है। ग्राम सगड़ा झपनी में तैयार हो रहे इस जंगल में अब तक 6 हजार 990 पौधे लगाए जा चुके हैं। ये पौधे 2 से 3 साल में पूरी तरह से विकसित हो जाएंगे। बुधवार को बरगी विधायक नीरज सिंह, कलेक्टर राघवेंद्र सिंह, जिला पंचायत सीईओ अभिषेक गेहलोत, जिला पंचायत अध्यक्ष आशा मुकेश गोटिया, उपाध्यक्ष विवेक पटेल, जनपद पंचायत जबलपुर के अध्यक्ष चंद्र किरण गिरी सहित कई अधिकारी और जनप्रतिनिधियों ने पौधारोपण किया। प्रदेश का पहला मियावाकी पद्धति का जंगल
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिवस 17 सितंबर से प्रारंभ हुए सेवा पखवाड़ा अभियान के अंतर्गत जबलपुर जिले ने एक नवाचार के तौर पर मियावाकी पद्धति से नमो उपवन के विकास की शुरुआत की गई है। यह पूरे प्रदेश में संभवत: अनूठा कार्यक्रम है। नवाचार के तहत नर्मदा किनारे बसे बरगी विधानसभा के ग्राम पंचायत सगड़ा झपनी गांव को चुना है। नर्मदा भक्तों के लिए आश्रय स्थल बनेगा
दरअसल, नर्मदा परिक्रमा पथ पर नर्मदा भक्तों के लिए आश्रय स्थल के लिए चिंह्नित भूमि में से करीब 26 हजार वर्ग फुट पर नमो उपवन को विकसित किया जा रहा है। बुधवार को सेवा पखवाड़ा के पहले दिन पौधारोपण का कार्यक्रम आयोजित किया गया। क्या है मियावाकी पद्धति
मियावाकी पद्धति एक वैज्ञानिक पौधारोपण तकनीक है, जिसे जापान के प्रसिद्ध वनस्पति वैज्ञानिक डॉ. अकीरा मियावाकी ने विकसित किया। इस पद्धति का उद्देश्य प्राकृतिक वनों की तरह घने, आत्मनिर्भर और जैव विविधता से परिपूर्ण जंगल तैयार करना है। इस पद्धति में भूमि की गहरी खुदाई कर उसमें जैविक खाद, गोबर खाद और कम्पोस्ट मिलाया जाता है। फिर 3 पौधे प्रति वर्ग मीटर की घनत्व से विभिन्न प्रजातियों के पौधे लगाए जाते हैं। नियमित सिंचाई, मल्चिंग और रखरखाव के कारण 2-3 वर्षों में पौधे पूरी तरह विकसित होकर घना जंगल तैयार कर देते हैं। माँ शब्द के आकार का है नमो उपवन
ग्राम सगड़ा झपनी में नमो उपवन का निर्माण नर्मदा परिक्रमावासी के आश्रय के लिए पहाड़ी पर बनाया जा रहा है। कुल सात एकड़ के इस पूरे क्षेत्र में तार फेंसिंग कर दी गई है। 26 हजार वर्ग फीट में मियावाकी तकनीक से पौधे रोपे जा चुके हैं। इनमें सीताफल, नीम, जामुन, आम, अर्जुन, गुलमोहर, इमली, कदम, गुलर, शिशम प्रजाति के 2 हजार 330 पौधे, कचनार, झारूल, करंजी, आवंला, मौलश्री, अमलतास, कनेर (पीला), टीकोमा, बाटलब्रश, बेल प्रजाति के 2 हजार 330 पौधे रोपे गए। जबकि चांदनी, चमेली, मधुकामनी, कनेर (लाल), मोगरा, मेंहदी, गंधराज, मधुमालती, कलिंद्रा, देसीरोज प्रजाति के भी 2 हजार 330 पौधे लगाए गए। कुल 6 हजार 990 पौधे मियावाकी पद्धति से रोपित किए जा चुके हैं। विपरीत परिस्थितियों में की खुदाई
पहाड़ी पर ढलान और कठोर चट्टानों वाली इस भूमि पर विशेष प्रयास ग्रामीणों के साथ मिलकर सरपंच और अन्य अधिकारियों ने किए हैं। जिला पंचायत के CEO अभिषेक गेहलोत ने बताया- विपरीत परस्थितियों में चुनौतियां का सामना करते हुए पौधारोपण के लिए गड्‌ढे कराए हैं। पौधारोपण में स्थानीय स्तर पर निर्मित किए गए जीवामृत का उपयोग किया जा रहा है। भविष्य की योजना
भविष्य में यहां पर नर्मदा परिक्रमा वासियों के लिए आश्रय स्थल का निर्माण किया जाएगा। सर्व सुविधायुक्त नमो उपवन का लाभ नर्मदा परिक्रमावासी के साथ-साथ जिले के नागरिकों को पर्यटन के रूप मिल सकेगा। भविष्य में इस स्थान पर आजीविका मिशन से ‘होम स्टे’, गौशाला भी विकसित किए जाएंगे।

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