भोपाल में जश्न-ए-अदब साहित्योत्सव का समापन:वसीम बरेलवी के शेरों ने लूटी महफिल, कहा-हजारों दवाएं बेकार हैं इस दाद के आगे

हिंदी पखवाड़े के तहत राजधानी में साहित्य, संगीत और नृत्य का अद्भुत संगम देखने को मिला। जहांनुमा पैलेस के दरबार हॉल में शनिवार को दो दिवसीय ‘जश्न-ए-अदब साहित्योत्सव- कल्चरल कारवां’ का समापन हुआ। आयकर विभाग और भारतीय रेलवे वित्त निगम के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम में देश के दिग्गज कलाकारों के साथ युवा प्रतिभाओं ने भी अपनी कला से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया। शाम की सबसे खास पेशकश रही मशहूर शायर वसीम बरेलवी की शायरी, जिन्होंने अपने चिर-परिचित अंदाज में एक-एक शेर सुनाकर महफिल को झूमने पर मजबूर कर दिया। उन्होंने कहा ‘कहां गई मेरे चेहरे की झुर्रियां, ये नन्हें बच्चे के हाथों ने क्या कमाल किया” और फिर भोपाल की सरजमीं को सलाम करते हुए पढ़ा- ‘कोई भी आलम हो खुशबू की जुबां रखता है तू, शहर तेरा खुद बताता है कहां रहता है तू, मेरी तेरी सोच में कुछ इस बला का फर्क है, मैं वहां हो ही नहीं सकता जहां रहता है तू।’ श्रोताओं की गूंजती तालियों के बीच उन्होंने मुस्कराकर कहा कि ‘हजारों दवाएं बेकार हैं इस दाद के आगे, इन्हीं का असर है, जो इस उम्र में यहां खड़ा हूं।’ बड़े भाई साहब’ और ‘कफन’ के नाट्य मंचन से हुई शुरुआत
दोपहर 2 बजे से रात 10 बजे तक चले उत्सव की शुरुआत मुंशी प्रेमचंद की कहानियों ‘बड़े भाई साहब’ और ‘कफन’ के नाट्य मंचन से हुई। गोपाल दुबे के निर्देशन में प्रस्तुत इस नाटक ने दर्शकों को सोचने पर मजबूर कर दिया। इसके बाद राजीव सिंह के सूफी गायन ने माहौल को सूफियाना रंग में रंग दिया। छात्र कलाकारों की सारंगी वादन प्रस्तुति ने शास्त्रीय संगीत की मिठास घोल दी। युवा कलाकारों को मंच देने के उद्देश्य से आयोजित संगीत समारोह में भोपाल के आमिर खान (तबला) और मुहम्मद आसिफ (सारंगी) ने अपनी लयकारी से दर्शकों की भरपूर तालियां बटोरीं। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त कथक नृत्यांगना डॉ. विधा लाल ने अपनी टीम के साथ मनमोहक कथक प्रस्तुत किया। भारी बारिश के बावजूद उनके नृत्य ने दरबार हॉल के वातावरण को और जीवंत कर दिया। शास्त्रीय संगीत का जादू तब छा गया जब पद्मभूषण पंडित सज्जन मिश्रा और स्वरांश मिश्रा ने भजन “चलो मन वृंदावन की ओर” प्रस्तुत कर श्रोताओं को भक्ति रस में डुबो दिया। समापन से पहले आयोजित भव्य मुशायरे में फरहत एहसास, ज़फर सेहबाई, अज़्म शाकिरी, आलोक अविरल, कुंवर रंजीत चौहान, अश्विनी कुमार चांद, जावेद मुशिरी, अनस फैजी और नितिन कबीर ने अपनी नज़्मों और ग़ज़लों से रात को यादगार बना दिया। अंत में जश्न-ए-अदब के संस्थापक कुंवर रंजीत चौहान ने सभी कलाकारों और दर्शकों का आभार व्यक्त किया और अगले वर्ष इस महोत्सव को और बड़े स्तर पर आयोजित करने की घोषणा की।

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